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बदलते मौसम का बढ़ता जोखिम -डॉ. सत्यवान सौरभ

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June 26, 2026
in ट्रेंडिंग न्यूज़, दिल्ली, राष्ट्रीय, विशेष
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बदलते मौसम का बढ़ता जोखिम -डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत में मानसून केवल एक ऋतु नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल-संसाधनों और जनजीवन की धुरी है। सदियों से मानसून को जीवनदायी माना जाता रहा है क्योंकि इसकी वर्षा खेतों को हरियाली देती है, नदियों और जलाशयों को भरती है तथा भीषण गर्मी से राहत प्रदान करती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मानसून का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। अब यह केवल राहत लेकर नहीं आता, बल्कि अपने साथ अनेक प्रकार के जोखिम भी लेकर आता है। कहीं अचानक बादल फटने की घटनाएँ होती हैं, कहीं तेज़ हवाओं और गरज-चमक वाले तूफानों से जनजीवन प्रभावित होता है, तो कहीं आकाशीय बिजली लोगों की जान ले लेती है। बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून से जुड़े खतरे पहले की तुलना में अधिक गंभीर और व्यापक हो गए हैं। यही कारण है कि मौसम संबंधी जोखिम आज केवल वैज्ञानिक अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय चिंता का प्रश्न भी बन चुके हैं।
वर्तमान समय में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि मौसम की पारंपरिक प्रकृति में परिवर्तन आ रहा है। पहले जहाँ वर्षा अपेक्षाकृत नियमित और संतुलित होती थी, वहीं अब लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक अत्यधिक वर्षा होने लगी है। इसी प्रकार गरज-चमक वाले तूफानों और आकाशीय बिजली की घटनाओं में भी वृद्धि देखी जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने वायुमंडल की संरचना और व्यवहार को प्रभावित किया है। वातावरण में अधिक ऊर्जा और अधिक नमी उपलब्ध होने के कारण मौसमीय घटनाएँ अधिक तीव्र और अनिश्चित हो रही हैं। इसका सीधा असर मानव जीवन, कृषि, बुनियादी ढाँचे और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है।
आकाशीय बिजली उन प्राकृतिक घटनाओं में से एक है जो हर वर्ष हजारों लोगों को प्रभावित करती है। भारत में बिजली गिरने से होने वाली मौतों की संख्या कई अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में अधिक रहती है। विशेष चिंता का विषय यह है कि अधिकांश पीड़ित ग्रामीण क्षेत्रों से होते हैं, जहाँ बड़ी संख्या में लोग खुले वातावरण में काम करते हैं। किसान, खेतिहर मजदूर, पशुपालक और निर्माण कार्यों से जुड़े श्रमिक मौसम के इन खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। जब अचानक बादल घिरते हैं और गरज-चमक शुरू होती है, तब कई लोग खतरे की गंभीरता को नहीं समझ पाते और खुले स्थानों पर ही बने रहते हैं। परिणामस्वरूप आकाशीय बिजली की चपेट में आकर अनेक लोगों की जान चली जाती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो आकाशीय बिजली का निर्माण वायुमंडल में होने वाली जटिल प्रक्रियाओं का परिणाम है। जब धरातल अत्यधिक गर्म हो जाता है और उसके ऊपर की परतों में अपेक्षाकृत ठंडी हवा मौजूद रहती है, तब गर्म और नम हवा तेजी से ऊपर उठने लगती है। यह प्रक्रिया संवहन कहलाती है। ऊपर उठती हुई हवा ठंडी होकर संघनित होती है और बादलों का निर्माण करती है। यदि वातावरण में पर्याप्त नमी और ऊर्जा मौजूद हो, तो ये बादल विशाल क्यूम्यलोनिम्बस बादलों का रूप ले लेते हैं। इन्हीं बादलों में पानी की बूंदों, बर्फ के कणों और ओलों के बीच होने वाली टक्करों से विद्युत आवेश उत्पन्न होते हैं। जब आवेशों का असंतुलन अत्यधिक बढ़ जाता है, तब बिजली चमकती है और धरती तथा बादलों के बीच विद्युत निर्वहन होता है।
मानसून के दौरान समुद्रों से आने वाली नम हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में पहुँचती हैं। ये हवाएँ बड़ी मात्रा में जलवाष्प लेकर आती हैं, जो बादलों के निर्माण और वर्षा के लिए आवश्यक होती है। लेकिन यही नमी जब अत्यधिक गर्म वातावरण से मिलती है, तो शक्तिशाली तूफानों का निर्माण भी कर सकती है। नमी और तापमान का यह संयोजन मौसमीय अस्थिरता को बढ़ाता है। यही कारण है कि मानसून के महीनों में गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाएँ अधिक होती हैं। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ेगा, वैसे-वैसे वायुमंडल अधिक नमी धारण करेगा और इस प्रकार की घटनाओं की संभावना भी बढ़ती जाएगी।
जलवायु परिवर्तन इस पूरे परिदृश्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। औद्योगीकरण, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई और अनियंत्रित शहरीकरण ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ा दी है। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। तापमान में यह वृद्धि केवल गर्मी बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मौसम तंत्र को प्रभावित कर रही है। गर्म वातावरण अधिक नमी धारण करता है, जिससे तीव्र वर्षा और गरज-चमक वाले तूफानों की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि आज मौसम पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित और चरम दिखाई देता है।
शहरीकरण भी मौसमीय जोखिमों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बड़े शहरों में कंक्रीट, डामर और भवनों की अधिकता के कारण हीट आइलैंड प्रभाव उत्पन्न होता है। इससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो जाता है। गर्म सतहें हवा को तेजी से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर बादलों और तूफानों के निर्माण की संभावना बढ़ सकती है। इसके अतिरिक्त, शहरी क्षेत्रों में जल निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण भारी वर्षा होने पर जलभराव और बाढ़ जैसी समस्याएँ भी गंभीर रूप धारण कर लेती हैं।
भारत की भौगोलिक विविधता भी मौसमीय घटनाओं को प्रभावित करती है। हिमालयी क्षेत्रों में पर्वतों के कारण हवा तेजी से ऊपर उठती है, जिससे बादलों का निर्माण अधिक होता है। पूर्वोत्तर भारत में अत्यधिक नमी और पर्वतीय भूभाग मिलकर तीव्र वर्षा की परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। मध्य भारत और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में गर्मी और नमी का संयोजन गरज-चमक वाले तूफानों को जन्म देता है। वहीं तटीय क्षेत्रों में समुद्री हवाओं और भूमि की गर्मी के बीच अंतःक्रिया मौसमीय गतिविधियों को प्रभावित करती है। इस प्रकार भारत का प्रत्येक क्षेत्र अपने-अपने भौगोलिक और जलवायु संबंधी कारकों के कारण अलग-अलग प्रकार के जोखिमों का सामना करता है।
मौसमीय जोखिमों का सबसे बड़ा प्रभाव समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अक्सर सुरक्षित आश्रयों और समय पर सूचना से वंचित रहते हैं। कई बार बिजली गिरने या तेज़ तूफान आने की चेतावनी जारी होने के बावजूद जानकारी अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाती। इसके अतिरिक्त, आर्थिक सीमाएँ भी लोगों को जोखिम उठाने के लिए मजबूर करती हैं। किसान और मजदूर अक्सर मौसम खराब होने के बावजूद काम जारी रखते हैं क्योंकि उनकी आजीविका उसी पर निर्भर होती है। ऐसी परिस्थितियों में प्राकृतिक जोखिम सामाजिक और आर्थिक जोखिमों में बदल जाते हैं।
मौसम संबंधी आपदाओं से होने वाली क्षति को कम करने के लिए केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए जन-जागरूकता और मौसम-साक्षरता को बढ़ाना भी आवश्यक है। लोगों को यह समझाना होगा कि गरज सुनाई देने पर खुले स्थानों से दूर जाना क्यों आवश्यक है, ऊँचे पेड़ों के नीचे खड़े होना कितना खतरनाक हो सकता है और बिजली चमकने के दौरान किन सावधानियों का पालन करना चाहिए। स्कूलों, पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और मीडिया को इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। यदि समाज मौसमीय जोखिमों को समझने लगे, तो अनेक जानें बचाई जा सकती हैं।
वर्तमान समय में मौसम विज्ञान ने उल्लेखनीय प्रगति की है। उपग्रह, डॉप्लर रडार, स्वचालित मौसम केंद्र और उन्नत कंप्यूटर मॉडल मौसम के पूर्वानुमान को अधिक सटीक बना रहे हैं। अब कई मामलों में गरज-चमक वाले तूफानों और बिजली गिरने की संभावना का पूर्वानुमान पहले से लगाया जा सकता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग और अन्य संस्थाएँ नियमित रूप से चेतावनियाँ जारी करती हैं। लेकिन चुनौती यह है कि इन चेतावनियों को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुँचाया जाए और उन्हें कार्रवाई के लिए प्रेरित किया जाए। केवल सूचना देना पर्याप्त नहीं है; यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि लोग उस सूचना को समझें और उसके अनुसार व्यवहार करें।
सरकारों को मौसमीय जोखिम प्रबंधन को विकास योजनाओं का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। बिजली गिरने की घटनाओं वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहाँ विशेष सुरक्षा उपाय लागू किए जा सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित सामुदायिक आश्रय बनाए जा सकते हैं। कृषि कार्यों के लिए मौसम आधारित सलाह प्रणाली को मजबूत किया जा सकता है। स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, मोबाइल तकनीक और डिजिटल संचार माध्यमों का उपयोग करके समय पर चेतावनी संदेश भेजे जा सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए दीर्घकालिक प्रयास भी आवश्यक हैं। वनों का संरक्षण, हरित ऊर्जा का विस्तार, कार्बन उत्सर्जन में कमी और टिकाऊ विकास की नीतियाँ भविष्य के जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती हैं। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो मौसमीय घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ सकती हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटना केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा और सतत विकास की भी आवश्यकता है।
बदलते मौसम के इस दौर में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि प्राकृतिक घटनाएँ अब पहले जैसी नहीं रहीं। मानसून की वर्षा, गरज-चमक, तूफान और आकाशीय बिजली जैसी घटनाएँ अधिक जटिल और जोखिमपूर्ण होती जा रही हैं। इनसे बचाव का सबसे प्रभावी उपाय वैज्ञानिक समझ, समय पर चेतावनी, जन-जागरूकता और सामुदायिक तैयारी है। यदि हम मौसम को केवल भाग्य या प्राकृतिक नियति मानकर छोड़ देंगे, तो जोखिम बढ़ते रहेंगे। लेकिन यदि हम विज्ञान, नीति और सामाजिक सहभागिता को साथ लेकर चलें, तो इन खतरों के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मानसून भारत की जीवनरेखा है और आगे भी रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसके बदलते स्वरूप को समझें और उसके अनुरूप अपनी नीतियों, व्यवस्थाओं और व्यवहार में परिवर्तन करें। मौसमीय जोखिमों के प्रति सजग समाज ही भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकता है। बदलते मौसम के इस युग में तैयारी ही सुरक्षा है और समझ ही सबसे बड़ा बचाव।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

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Tags: Climate change
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