आर0टी0आई0 कानून को कमजोर करके पी0एम0 केयर फण्ड जैसे घोटाले किए गए- डाॅ0 सी0पी0 राय
डाॅ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और सोनिया गांधी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में 12 अक्टूबर 2005 को ऐतिहासिक सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम अस्तित्व में आया। यह यूपीए सरकार के अधिकार आधारित एजेंडा की पहली कड़ी थी जिसमें मनरेगा (2005), वन अधिकार अधिनियम (2006), शिक्षा का अधिकार (2009), भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा का अधिकार अधिनियम (2013) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) शामिल थे।
1. कानून पर हमले(सूचना का अधिकार अधिनियम 2005)
ऽ 2019 के संशोधनों ने स्वतंत्रता को कमजोर किया और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ाया।
2019 के संशोधन ने सूचना आयोगों की स्वायत्तता को कमजोर कर दिया। पहले, आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष का तय था और उनकी सेवा शर्तें सुरक्षित थी। संशोधन के बाद केन्द्र सरकार को कार्यकाल और सेवा शर्तें तय करने का अधिकार दे दिया गया, जिससे स्वतंत्रता प्रभावित हुई और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ा।
ऽ 2023-डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम और धारा 44(3)
महत्वपूर्ण सार्वजनिक डेटा को ‘‘निजी’’ मानकर यह संशोधन मतदाता सूची, व्यय विवरण या अन्य जनहित से जुड़ी सूचनाओं के प्रकटीकरण से इन्कार या रास्ता खोल देता है। इससे सार्वजनिक निगरानी की प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ता है-यही प्रक्रिया थी जिसके जरिए एमपीएलएडी फण्ड के दुरूपयोग, मनरेगा में फर्जी लाभार्थियों और अस्पष्ट राजनीतिक फंडिंग जैसी अनेक गड़बड़ियां उजागर हुई थीं।
ऽ रिक्तियां
डाॅ0 सी0पी0राय ने कहा कि केन्द्रीय सूचना आयेाग आज तक अपनी अब तक की सबसे कमजोर स्थिति में है- 11 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल दो आयुक्त कार्यरत हैं और सितम्बर 2025 के बाद मुख्य आयुक्त का पद भी रिक्त है। इस तरह की स्थिति यूपीए शासन के दौरान कभी नहीं रही।
सामाजिक कार्यकर्ताओं जैसे अंजलि भारद्वाज की याचिकाओं पर कार्यवाही करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र और राज्यों को नियुक्तियों की समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया था। फिर भी, बार-बार न्यायिक आदेशों के बावजूद कई पद महीनों तक रिक्त पड़े हैं। सतर्क नागरिक संगठन की रिपोर्ट ‘रिपोर्ट कार्ड और इन्फार्मेशन कमिशन्स(2023-24), जो अक्टूबर 2024 में जारी हुई, के अनुसार 29 में से 7 राज्य सूचना आयोग विभिन्न अवधियों के दौरान निष्क्रिय रहे।
ऽ लंबित मामले और डेटा की अनुपलब्धता
जून 2024 तक देश भर के 29 आयोगों में लगभग 4,05,000 अपीलें और शिकायतें लंबित थीं- जो 2019 की तुलना में लगभग दोगुनी हैं। नवम्बर 2024 तक केवल केन्द्रीय सूचना आयेाग में ही लगभग 23000 लंबित मामले हैं।
3. व्यक्तियांे पर हमले
भोपाल की कार्यकर्ता और पर्यावरणविद शहला मसूद, जो अवैध खनन को उजागर करती थीं कि उनके ही घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस मामले की सीबीआई जांच में पाया गया कि आरोपियों में एक इंटीरियर डिजाइनर भी शामिल था। सतीश शेट्टी, जो भूमि घोटालों को उजागर करने के लिए जाने जाते थे, उन पर सुबह की सैर के दौरान धारदार हथियारों से हमला कर हत्या कर दी गई। सीबीआई जांच में इसमें रियल एस्टेट माफिया की संलिप्तता सामने आई।
ऐसे मामले इस बात की भयावह याद दिलाते हैं कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को कितने खतरों का सामना करना पड़ता है। अनेक कार्यकर्ता और नागरिक जो आरटीआई का उपयोग करते हैं उन्हें उत्पीड़न, धमकियों और हमलों का शिकार होना पड़ा है। इससे लोगों के भीतर भय का माहौल बना है और नागरिक आरटीआई का निर्भयता से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।
डाॅ0 राय ने कहा कि व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन अधिनियम, जिसे पारित किया जा चुका है, अब तक लागू नहीं हुआ है और इसके नियम अधिसूचित नहीं किए गए हैं। यह विधेयक यूपीए सरकार द्वारा पेश किया गया था और संसद के दोनों सदनों से पारित भी हुआ था, लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल (2014 के बाद) में न तो कानून लागू किया गया और न ही नियम बनाए गए। सुरक्षात्मक तंत्र के अभाव में प्रशासनिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले व्यक्ति धमकियों, उत्पीड़न और हिंसक हमलों के प्रति असुरक्षित बने हुए हैं। इस अधिनियम का उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना था जो भ्रष्टाचार या गलत कार्यों का खुलासा करते हैं लेकिन इसके लागू न होने से ये सभी सुरक्षा उपाय अर्थहीन हो गए हैं। अमेरिका या यूरोपीय संघ जैसे लोकतंत्रों ने माना है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा आवश्यक है, जबकि भारत एक ऐसा अपवाद है जहां कानून होते हुए भी सरकार ने इसे लागू करने से परहेज किया है।
सूचना का अधिकार अधिनियम की 20 वीं वर्षगांठ पर हम दोहराते हैं कि सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत के नागरिकों के संवैधानिक और सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस निम्नलिखित मांगे रखती है-
1. 2019 के संशोधनों को निरस्त कर सूचना आयोगों की स्वतंत्रता बहाल की जाए और आयुक्तों के लिए 5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल व सुरक्षित सेवा शर्तें सुनिश्चित की जाएं।
2. डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन(डीपीडीपी) अधिनियम की उन धाराओं (धारा 44(3)) की समीक्षा व संशोधन किया जाए जो आरटीआई के जनहित उद्देश्य को कमजोर करती हैं।
3. केन्द्र और राज्य आयोगों में सभी रिक्तियां पारदर्शी व समयबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से तुरंत भरी जाएं।
4. आयोगों के लिए कार्य निष्पादन मानक तय किए जाएं और निपटान दर की सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य की जाए।
5. व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन अधिनियम को पूर्ण रूप से लागू कर आरटीआई उपयोगकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स को सशक्त सुरक्षा प्रदान की जाए।
6. आयोगों में विविधता सुनिश्चित की जाए- पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और महिला प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।










