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सूखती धरती, बढ़ती प्यास : जल दिवालियापन की ओर बढ़ता भारत

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July 6, 2026
in ट्रेंडिंग न्यूज़, दिल्ली, राष्ट्रीय, विशेष
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सूखती धरती, बढ़ती प्यास : जल दिवालियापन की ओर बढ़ता भारत

– डॉ. सत्यवान सौरभ
जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, सभ्यता, आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। मानव इतिहास की अधिकांश महान सभ्यताएँ नदियों के किनारे विकसित हुईं, क्योंकि जल ही जीवन और समृद्धि का मूल स्रोत रहा है। किंतु इक्कीसवीं शताब्दी में जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने विश्व के अनेक देशों के समक्ष गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। भारत इस संकट का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभर रहा है। विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या का भार वहन करने वाला भारत विश्व के केवल लगभग 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधनों का स्वामी है। बढ़ती जनसंख्या, तीव्र शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, कृषि क्षेत्र में जल का अत्यधिक दोहन, जल प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन तथा जल प्रबंधन की संरचनात्मक कमियों ने देश को ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ केवल जल संकट की बात करना पर्याप्त नहीं रह गया है। अनेक विशेषज्ञों का मत है कि यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ जारी रहीं तो भारत जल संकट से आगे बढ़कर जल दिवालियापन की स्थिति में पहुँच सकता है। जल दिवालियापन वह अवस्था है जब उपलब्ध जल संसाधन प्राकृतिक पुनर्भरण की क्षमता से अधिक दोहन के कारण समाप्तप्राय हो जाएँ, जल की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाए कि उसका उपयोग कठिन हो जाए तथा समाज, कृषि, उद्योग और पारिस्थितिकी की आवश्यकताओं की पूर्ति संभव न रह जाए।
भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में पाँच हजार घन मीटर से अधिक थी, जो लगातार घटते-घटते जल तनाव की सीमा के निकट पहुँच चुकी है। अनेक महानगर समय-समय पर पेयजल संकट का सामना कर चुके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। अनेक नदियाँ प्रदूषण के कारण जीवनदायिनी के बजाय प्रदूषण वाहक बनती जा रही हैं। वर्षा की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। यह संकट केवल प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि जल प्रबंधन की दीर्घकालिक कमजोरियों, नीतिगत असंतुलनों और सामाजिक व्यवहारों का परिणाम भी है।
भारत की सबसे बड़ी समस्या भूजल पर अत्यधिक निर्भरता है। देश विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है। सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए लाखों की संख्या में ट्यूबवेल संचालित हैं। कई राज्यों में मुफ्त अथवा अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली ने भूजल दोहन को और प्रोत्साहित किया है। जल निकासी की तुलना में पुनर्भरण बहुत कम होने के कारण भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। अनेक क्षेत्रों में कुएँ और हैंडपंप सूख चुके हैं तथा किसानों को अधिक गहराई तक बोरिंग करनी पड़ रही है। इससे ऊर्जा लागत बढ़ रही है और छोटे किसान आर्थिक संकट में फँस रहे हैं। कई स्थानों पर भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक तथा नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने से सार्वजनिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है।
जल प्रबंधन की दूसरी बड़ी कमजोरी वर्षा जल के समुचित संचयन का अभाव है। भारत में अधिकांश वर्षा कुछ ही महीनों में होती है, किंतु उसका बड़ा भाग नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है। यदि इस जल का वैज्ञानिक ढंग से संग्रहण और पुनर्भरण किया जाए तो भूजल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दुर्भाग्यवश पारंपरिक जल संरचनाएँ जैसे तालाब, बावड़ियाँ, जोहड़, कुएँ और झीलें उपेक्षा, अतिक्रमण और प्रदूषण का शिकार हो गई हैं। शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन को कानूनी रूप से अनिवार्य तो बनाया गया है, परंतु उसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी सीमित है।
जल प्रदूषण भी जल संकट को जल दिवालियापन की दिशा में ले जाने वाला प्रमुख कारण है। देश की अधिकांश नदियाँ घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरे तथा कृषि रसायनों से प्रभावित हैं। बड़ी मात्रा में बिना उपचारित सीवेज प्रतिदिन नदियों में छोड़ा जाता है। अनेक उद्योग पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं करते। परिणामस्वरूप उपलब्ध जल की गुणवत्ता निरंतर गिर रही है। जल की मात्रा चाहे जितनी हो, यदि वह उपयोग योग्य नहीं है तो वास्तविक जल उपलब्धता स्वतः कम हो जाती है। यह स्थिति स्वास्थ्य, कृषि, मत्स्य पालन और जैव विविधता सभी के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करती है।
कृषि क्षेत्र में जल का अत्यधिक और अल्पदक्ष उपयोग भी वर्तमान संकट का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। भारत के कुल मीठे जल का लगभग अस्सी प्रतिशत भाग कृषि में प्रयुक्त होता है, किंतु सिंचाई की दक्षता अभी भी निम्न है। अधिकांश क्षेत्रों में पारंपरिक बाढ़ सिंचाई पद्धति अपनाई जाती है, जिसमें बड़ी मात्रा में जल व्यर्थ बह जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा सरकारी खरीद की नीतियों ने कई राज्यों में धान और गन्ने जैसी अत्यधिक जल-आवश्यक फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया है, जबकि उन क्षेत्रों की जल उपलब्धता इसके अनुकूल नहीं है। इससे भूजल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और दीर्घकाल में कृषि की स्थिरता भी प्रभावित होती है।
शहरी जल प्रबंधन भी गंभीर कमियों से ग्रस्त है। तेजी से बढ़ते शहरों में पाइपलाइन से जल की भारी हानि होती है। गैर-राजस्व जल की मात्रा कई नगरों में अत्यधिक है। उपचारित अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग बहुत कम किया जाता है। झीलों और तालाबों पर अतिक्रमण होने से वर्षा जल का प्राकृतिक संचयन समाप्त हो रहा है। विडंबना यह है कि एक ओर शहरों में वर्षा के समय जलभराव होता है और दूसरी ओर गर्मियों में वही शहर जल संकट से जूझते हैं। यह दर्शाता है कि हमारी जल प्रबंधन प्रणाली प्राकृतिक जल चक्र के अनुरूप विकसित नहीं हो सकी है।
जल प्रबंधन की एक अन्य संरचनात्मक कमजोरी संस्थागत विखंडन है। जल से संबंधित कार्य अनेक मंत्रालयों, विभागों और एजेंसियों में विभाजित हैं। सिंचाई, पेयजल, भूजल, नदी संरक्षण, शहरी जलापूर्ति और पर्यावरण संरक्षण अलग-अलग संस्थाओं के अधीन हैं। इनके बीच समन्वय का अभाव समेकित जल नीति के निर्माण और प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करता है। नदी बेसिन आधारित योजना के स्थान पर प्रशासनिक सीमाओं के आधार पर जल प्रबंधन किया जाता है, जिससे संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग नहीं हो पाता।
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा बना दिया है। मानसून की अनिश्चितता, अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा, लंबे शुष्क काल, हिमालयी हिमनदों के पिघलने तथा तापमान वृद्धि ने जल चक्र को प्रभावित किया है। इससे बाढ़ और सूखे दोनों की आवृत्ति तथा तीव्रता बढ़ी है। जल संसाधनों की योजना यदि पुराने जलवायु पैटर्न के आधार पर बनाई जाएगी तो भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति संभव नहीं होगी।
इन सभी चुनौतियों के कारण जल संकट केवल संसाधन संबंधी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन चुका है। जल की कमी से कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे खाद्यान्न सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उद्योगों की उत्पादन क्षमता घट सकती है। जलजनित रोगों का प्रसार बढ़ सकता है। राज्यों और क्षेत्रों के बीच जल विवाद तीव्र हो सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पलायन होने की संभावना भी बढ़ सकती है। अतः जल सुरक्षा को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय प्राथमिकता बनाना समय की आवश्यकता है।
इस चुनौती का समाधान केवल नए बाँध बनाने या अधिक भूजल निकालने से संभव नहीं है। इसके लिए जल प्रबंधन की संपूर्ण सोच में परिवर्तन आवश्यक है। सबसे पहले जल को एक सीमित और मूल्यवान प्राकृतिक संपदा के रूप में स्वीकार करना होगा। जल संसाधनों का प्रबंधन नदी बेसिन आधारित समेकित दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए, जिसमें सतही जल, भूजल, वर्षा जल और पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं को एक साथ ध्यान में रखा जाए। प्रत्येक नदी घाटी के लिए वैज्ञानिक जल बजट तैयार किया जाए और उसी के अनुसार जल उपयोग की योजना बनाई जाए।
भूजल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रत्येक क्षेत्र में भूजल निकासी और पुनर्भरण का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। जलभृतों का मानचित्रण, डिजिटल निगरानी तथा सामुदायिक भागीदारी पर आधारित भूजल शासन विकसित किया जाए। जहाँ भूजल का स्तर अत्यधिक गिर चुका है वहाँ निकासी पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाए तथा कृत्रिम पुनर्भरण की योजनाओं को व्यापक रूप से लागू किया जाए।
वर्षा जल संचयन को राष्ट्रीय जनांदोलन बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक भवन, विद्यालय, उद्योग और सरकारी संस्थान में वर्षा जल संचयन प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। गाँवों में तालाबों, जोहड़ों, बावड़ियों तथा अन्य पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया जाए। स्थानीय समुदायों को इनके संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी दी जाए ताकि जल संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम न रहकर सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन सके।
कृषि क्षेत्र में जल उपयोग दक्षता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का विस्तार किया जाए। कम जल वाली फसलों को प्रोत्साहन दिया जाए तथा फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिले। न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि प्रोत्साहनों को जल संरक्षण के अनुरूप पुनर्संतुलित किया जाए। मृदा स्वास्थ्य सुधार, प्राकृतिक खेती और जल संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर सिंचाई की आवश्यकता कम की जा सकती है।
शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट जल का उपचार और पुनर्चक्रण अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। उपचारित जल का उपयोग उद्योगों, निर्माण कार्यों, उद्यानों तथा अन्य गैर-पेय उपयोगों में किया जाए ताकि स्वच्छ जल पर दबाव कम हो। पाइपलाइन लीकेज को कम करने, स्मार्ट मीटरिंग अपनाने तथा जल वितरण प्रणाली के आधुनिकीकरण से भी जल बचत संभव है।
नदियों के संरक्षण को केवल सफाई अभियान तक सीमित न रखकर संपूर्ण नदी पारिस्थितिकी के संरक्षण से जोड़ा जाना चाहिए। बिना उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के प्रवाह पर कठोर नियंत्रण हो। आर्द्रभूमियों, बाढ़ मैदानों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों की रक्षा की जाए, क्योंकि यही जल पुनर्भरण और जैव विविधता के प्रमुख आधार हैं।
तकनीकी नवाचारों का भी व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए। रिमोट सेंसिंग, भू-स्थानिक सूचना प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स तथा स्मार्ट सेंसर आधारित जल निगरानी प्रणाली विकसित कर जल उपयोग की वास्तविक समय में निगरानी की जा सकती है। जल लेखांकन, जल ऑडिट और डेटा आधारित नीति निर्माण से संसाधनों का अधिक वैज्ञानिक उपयोग संभव होगा।
साथ ही, जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ना अनिवार्य है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से जल संरक्षण को सामाजिक आंदोलन का स्वरूप दिया जा सकता है। नागरिकों में यह चेतना विकसित करनी होगी कि प्रत्येक बूंद का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
भारत के समक्ष उपस्थित जल संकट वास्तव में विकास मॉडल की परीक्षा है। यदि वर्तमान जल प्रबंधन की कमियों को दूर नहीं किया गया तो जल संकट शीघ्र ही जल दिवालियापन में परिवर्तित हो सकता है, जिसके परिणाम अत्यंत व्यापक और दीर्घकालिक होंगे। किंतु यदि वैज्ञानिक योजना, प्रभावी शासन, तकनीकी नवाचार, पारंपरिक ज्ञान, सामुदायिक भागीदारी तथा जल संरक्षण की संस्कृति को एकीकृत किया जाए तो भारत इस संकट को अवसर में बदल सकता है। जल सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक, किसान, उद्योग, स्थानीय निकाय और नीति निर्माता की साझा जिम्मेदारी है। सतत विकास का भविष्य उसी समाज का होगा जो जल को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि साझा प्राकृतिक धरोहर मानकर उसका विवेकपूर्ण संरक्षण करेगा। यही दृष्टिकोण भारत को जल संकट से बाहर निकालकर दीर्घकालिक जल सुरक्षा और समावेशी विकास की दिशा में अग्रसर कर सकता है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)
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