3. कविता और औरत: घूँघट से गूँज तक”
(एक स्त्री की आत्मा से निकली आग)
मैं औरत हूँ — पर केवल देह नहीं,
मैं कविता हूँ — पर केवल लेख नहीं।
मुझमें माँ की ममता है, पर शेरनी की धार भी,
मैं झरनों सी शांत हूँ, पर ज्वालामुखी की पुकार भी।
घूँघट की ओट से जो आवाज़ उठी थी कभी,
वही आज मंचों से न्याय का घोष कर रही है अभी।
जिसे सदी दर सदी दबाया गया “मर्यादा” कहकर,
वो अब संविधान के पन्नों पर अधिकार लिख रही है दम भर।
मैंने देखा है वो वक़्त, जब शिक्षा एक सपना थी,
जब बेटियाँ बोझ थीं, और आँसू ही अपनी संपदा थी।
पर आज मेरी कलम में जो धार है,
वो हर दहेज की मांग पर प्रहार है।
तूने समझा मुझे कमज़ोर, नाज़ुक और भावुक,
पर भूल गया कि यही कोमलता कभी ज्वालामुखी बन उठेगी अचूक।
मैं चूल्हे की आँच थी, अब चाँद पर खोज की चमक हूँ,
मैं ‘कन्यादान’ नहीं, अब संविधान की शपथ हूँ।
मैं कविता में नहीं, मैं क्रिया में बोलती हूँ,
जब बेटियाँ ट्रैक्टर चलाती हैं, तब खेतों में क्रांति खोलती हूँ।
जब किसी बलात्कार पीड़िता की आँखें न्याय की प्यास हों,
तब मेरी एक पंक्ति भी संसद की नींद तोड़ दे, यही मेरी आस हो।
तू अगर रीतियों का रक्षक है,
तो मैं बदलाव की आदिम भूख।
तू अगर परंपरा की दीवार है,
तो मैं उस पर उगता हुआ प्रश्नसूत्र।
तू घूँघट से शुरू करता है मेरी परिभाषा,
मैं सवालों से खोलती हूँ तेरा हर झूठा मुखौटा।
मैंने अपने आँचल को अब आँसुओं से नहीं,
तलवार की धार से सी दिया है कहीं।
मेरी सिसकियों को तुमने सदियों तक ‘शालीनता’ समझा,
अब मेरी गूँज से अंबर काँपेगा, यही है संकल्प हमारा।
मैं वो औरत हूँ, जो अब तुम्हारे “सहनशीलता” के व्याख्यान नहीं सुनती,
मैं अब बोलती हूँ, लिखती हूँ, लड़ती हूँ — और जीतती भी हूँ।
मेरे पैरों की पायल अब शृंगार नहीं,
हर क़दम की आवाज़ है — क्रांति की तर्जनी।
मैं अब देवी नहीं, इंसान हूँ —
और मेरी कविता मेरा संविधान है।
4. “वो स्त्रियाँ सौभाग्यशाली थीं…”
वो स्त्रियाँ सच में सौभाग्यशाली रहीं हैं,
जिनके हिस्से में पुरुषों का सच्चा प्रेम आया है…
न केवल फूलों सा मुस्कुराता,
बल्कि काँटों के दिनों में भी साथ निभाता।
जो सिर्फ़ रूप नहीं,
रूदन भी समझ सका।
जो थकी हुई हथेलियों पर
अपने अधरों से सुकून रख सका।
जिसने चूड़ियों की खनक में
कभी सपनों की टूटन भी सुनी,
और ओढ़नी के रंगों में
उसकी आज़ादी की बुनावट जानी।
वो पुरुष जो प्रेम में पूजा नहीं,
पर बराबरी का स्पर्श दे सका,
जो स्त्री को ‘कम’ नहीं,
‘कभी’ नहीं कह सका।
हाँ, वो स्त्रियाँ सच में भाग्यशाली रहीं,
जिन्हें प्रेम में परछाईं नहीं,
पूरा अस्तित्व मिला।
जो सिर्फ़ पत्नी, माँ, या बहन नहीं,
एक ‘व्यक्ति’ की तरह जिया गया।
— प्रियंका सौरभ
5. तुम शकुनि नहीं, पर बनते क्यों हो?
तुम शकुनि नहीं, पर बनते हो,
चलाते हो चालें, छुपते हो परछाइयों में।
अपने मन के युद्ध को समझो,
क्यों खुद से लड़ते हो?
आत्मनिरीक्षण की सबसे कठिन यात्रा है,
जहाँ हर कदम सवाल बन जाता है।
तुम्हारे भीतर की महाभारत,
अभी भी अधूरी है, जारी है।
जागो उस भीतर के युद्ध से,
और अपने साये को स्वीकारो।
क्योंकि यह लड़ाई अंतर्मन की है,
और इसे जीतना ही जीवन है।
तुम शकुनि नहीं,
पर बनते क्यों हो?
खुद को देखो,
और सच से मत भागो।
6. द्रोणाचार्य की वर्ग नीति
ज्ञान बाँटना मेरा कर्म था,
पर न्याय कहीं खो गया।
पक्षपात की तलवार बनी मेरी नीति,
जिससे टूटे रिश्ते कई।
मैं वह शिक्षक था,
जो अपना कर्तव्य भूल गया।
ज्ञान मेरा धर्म था,
पर वर्ग नीति ने उसे बंदी बना लिया।
न्याय के बंधनों में उलझकर,
मैं खुद एक कैदी बन गया।
मेरी शिक्षा ने दी ठोकरें,
और मैंने रिश्ता तोड़ा।
क्या ज्ञान सही मायने में ज्ञान था?
या केवल सत्ता का हथियार?
यह प्रश्न मन में घुल गया,
और चुप्पी छा गई।
— प्रियंका सौरभ
मैंने सब कुछ छोड़ दिया,
अपने प्रेम को त्याग दिया।
अपने कर्तव्य को चुना,
और जीवन को प्रतिज्ञा बना लिया।
पर क्या त्याग प्रेम की मृत्यु है?
क्या बलिदान से दिल मर जाता है?
मैं वह भीष्म हूँ,
जो धर्म से बँधा है, पर अकेला है।
मेरी प्रतिज्ञा, मेरी शक्ति,
पर मेरी एक अधूरी कहानी भी है।
मन में छुपा दर्द कोई नहीं जानता,
पर मैं मजबूर था इस पथ पर चलने को।
यह त्याग मेरा धर्म था,
पर यह प्रेम की हत्या भी थी।
मैं वह पुरुष,
जो अपनी मर्जी से दूर हो गया।
मेरे शब्द कम, पर अर्थ गहरा था,
मेरी चुप्पी में भी प्यार झलकता था।
मैं वह साथी, जो समझता था सब कुछ,
पर खुद को दिखा नहीं पाता था।
मेरी सलाहें कभी तीखी, कभी मधुर थीं,
पर उनमें प्रेम की गहराई थी।
मैं था वह सहारा, जो खामोशी में छुपा,
और बुद्धिमत्ता से सबको राह दिखाता।
साथी तो थे, पर समझ की दूरी थी,
जो दिलों को जोड़ न सकी।
क्या प्रेम केवल कहने की बात है?
या चुप रहकर भी निभाने का हुनर?
मेरी चुप्पी की वह भाषा,
जो कोई न समझ पाया।
कभी वह दोस्ती,
कभी वह अकेलापन था।
धनुष को छोड़कर, तीरों को तोड़कर,
मैं घर लौटा, पर वह घर मेरा नहीं रहा।
जहाँ लड़ाई के शोर की जगह सन्नाटा था,
और रिश्तों की आवाज़ें खामोशी में डूब गई थीं।
बाहर की लड़ाई खत्म हुई,
पर भीतर का युद्ध और भी कठोर था।
यादें चुभतीं, मन टूटता,
और अकेलापन भी घातक था।
मैं वह अर्जुन हूँ, जो अब अपने घर में भी अकेला है,
जहाँ कोई सहारा नहीं, सिर्फ ख़ामोशी है।
घर की दीवारें मुझे घेरती हैं,
और मेरा मन टूटता जाता है।
यह घर नहीं, एक वीरान रणभूमि है,
जहाँ मैं खुद से लड़ रहा हूँ,
और अपनी ही सोच में खोया हूँ।