
मिलेट्स की मांग बढ़ रही है—लेकिन क्या किसानों को भी लाभ मिल रहा है?
डॉ. विजय गर्ग
मिलेट्स यानी मोटे अनाज आज फिर तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कभी इन्हें “गरीबों का अनाज” माना जाता था, लेकिन अब इन्हें पौष्टिक, जलवायु-अनुकूल और पर्यावरण के लिए उपयोगी खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जा रहा है। सरकारें, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता, खाद्य कंपनियाँ और रेस्तरां भी मिलेट्स में बढ़ती रुचि दिखा रहे हैं।
लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल अभी भी बना हुआ है—क्या इन अनाजों को उगाने वाले किसानों को भी इस बढ़ते अवसर का उचित हिस्सा मिल रहा है?
बाजरा, ज्वार, रागी, कंगनी और कुटकी जैसे मिलेट्स के अनेक फायदे हैं। इन्हें सामान्यतः चावल जैसी फसलों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है और ये कठिन जलवायु परिस्थितियों में भी अच्छी तरह उग सकते हैं। अपने पोषण गुणों के कारण मिलेट्स अब नाश्ते, स्नैक्स, आटे और तैयार खाद्य पदार्थों में भी शामिल हो रहे हैं।
लेकिन बढ़ती लोकप्रियता अपने आप किसानों की आय बढ़ने की गारंटी नहीं देती।
किसान मूल्य श्रृंखला की शुरुआत में है
शहरी बाजार में मिलेट आटे का एक पैकेट जिस कीमत पर बिकता है, वह कीमत उस किसान को मिलने वाली राशि से काफी अधिक हो सकती है जिसने वह अनाज पैदा किया है।
खेत से उपभोक्ता तक पहुँचने के बीच संग्रह, परिवहन, सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और खुदरा बिक्री जैसे कई चरण आते हैं। प्रत्येक चरण उत्पाद के मूल्य में वृद्धि करता है।
लेकिन अंतिम कीमत पर किसान का नियंत्रण अक्सर सबसे कम होता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—यदि मिलेट का बाजार बढ़ रहा है, तो किसान ही इस मूल्य श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी क्यों बना रहे?
उत्पादन केवल आधी कहानी है
किसानों को मिलेट उगाने के लिए प्रोत्साहित करना पर्याप्त नहीं है। उनके लिए भरोसेमंद बाजार भी होने चाहिए।
यदि किसान अधिक मिलेट पैदा करें लेकिन उन्हें उचित मूल्य पर बेचने के लिए मजबूत बाजार उपलब्ध न हो, तो अधिक उत्पादन का अर्थ अधिक आय नहीं होगा।
बेहतर खरीद व्यवस्था, स्थानीय प्रसंस्करण केंद्र, भंडारण सुविधाएँ और पारदर्शी बाजार किसानों के लिए बड़ा बदलाव ला सकते हैं। केवल विकल्पों की कमी के कारण किसानों को बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
सबसे बड़ा अवसर: मूल्य संवर्धन
मिलेट क्षेत्र में सबसे बड़े अवसरों में से एक प्रसंस्करण है।
कच्चे मिलेट का बाजार सीमित हो सकता है, लेकिन जब उसे आटा, नाश्ते का अनाज, स्नैक या अन्य मूल्य-वर्धित उत्पाद में बदला जाता है, तो उसका व्यावसायिक मूल्य काफी बढ़ सकता है।
फिर किसान केवल कच्चा माल पैदा करने वाला ही क्यों रहे?
किसान सहकारी समितियाँ और उत्पादक संगठन सफाई, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और मार्केटिंग में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। इससे किसान अपने उत्पाद से पैदा होने वाले मूल्य का बड़ा हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।
पारंपरिक फसलों को आधुनिक बाजारों की जरूरत
मिलेट्स पारंपरिक फसलें हैं, लेकिन उनका भविष्य आधुनिक उपभोक्ताओं की पसंद से भी जुड़ा हुआ है।
युवा उपभोक्ता केवल इसलिए पारंपरिक अनाज नहीं चुनते कि वे पौष्टिक हैं। स्वाद, सुविधा, पैकेजिंग, कीमत और आसानी से उपलब्धता भी महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए केवल नारे पर्याप्त नहीं हैं। नई सोच और नई तकनीक की आवश्यकता है।
पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक खाद्य तकनीक से जोड़ना होगा।
जलवायु-अनुकूल फसल, आर्थिक अवसर
मिलेट्स को अक्सर जलवायु-अनुकूल फसलों के रूप में देखा जाता है। अपेक्षाकृत कम पानी में उगने की क्षमता के कारण ये टिकाऊ कृषि के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
लेकिन जलवायु-अनुकूल खेती का पूरा बोझ किसानों पर नहीं डाला जा सकता।
यदि समाज चाहता है कि किसान ऐसी फसलें उगाएँ जो पर्यावरण के लिए लाभदायक हैं, तो किसानों को भी उसका आर्थिक लाभ मिलना चाहिए।
टिकाऊ कृषि तभी सफल हो सकती है, जब किसान की आजीविका भी टिकाऊ हो।
उपभोक्ता भी बदल सकते हैं भविष्य
उपभोक्ताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
जब लोग मिलेट उत्पाद खरीदते हैं तो वे उनकी मांग बढ़ाने में योगदान देते हैं। लेकिन वे यह भी पूछ सकते हैं कि उनका भोजन कहाँ से आया है और क्या किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिला है।
एक स्वस्थ अनाज के साथ एक स्वस्थ कृषि अर्थव्यवस्था भी होनी चाहिए।
‘मिलेट प्रोत्साहन’ से ‘मिलेट समृद्धि’ तक
मिलेट आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि बाजार में मिलेट के कितने नए उत्पाद आ गए हैं।
यह भी देखना होगा कि—
क्या मिलेट किसानों की आय बढ़ रही है?
क्या स्थानीय प्रसंस्करण से ग्रामीण रोजगार पैदा हो रहा है?
क्या किसानों को स्थिर बाजार मिल रहे हैं?
क्या महिलाओं और छोटे किसानों को मूल्य श्रृंखला का लाभ मिल रहा है?
क्या उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन उचित कीमत पर मिल रहा है?
लक्ष्य केवल उपभोक्ता-केंद्रित मिलेट बाजार नहीं, बल्कि किसान-केंद्रित मिलेट अर्थव्यवस्था बनाना होना चाहिए।
वास्तविक मिलेट क्रांति
मिलेट्स की मांग बढ़ रही है। उनकी पोषण क्षमता, पर्यावरणीय महत्ता और व्यावसायिक संभावनाओं को तेजी से पहचान मिल रही है।
लेकिन वास्तविक मिलेट क्रांति तब होगी, जब समृद्धि उपभोक्ता की थाली से वापस किसान के खेत तक पहुँचेगी।
मिलेट्स केवल एक लोकप्रिय खाद्य पदार्थ न बनें। वे उन किसानों के लिए लाभदायक फसल भी बनें, जो उन्हें उगाते हैं।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है—
“क्या मिलेट्स फल-फूल रहे हैं?”
सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—
“क्या मिलेट उगाने वाले किसान भी खुशहाल हो रहे हैं?”
डॉ. विजय गर्ग
रिटायर्ड प्रिंसिपल | शिक्षा स्तंभकार | शिक्षाविद्
अकादमिक संपादक, ऑनलाइन पत्रिका एफएनबीवर्ल्ड.कॉम
स्ट्रीट कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110
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