नई दिल्ली-वाजपेयी के मीडिया सलाहकार रहे अशोक टंडन ने अपनी नई किताब ‘अटल संस्मरण’ में किया ये धमाका
वाजपेयी को राष्ट्रपति और आडवाणी को PM बनाना चाहती थी BJP,
नई दिल्ली (BNE ): वाजपेयी के मीडिया सलाहकार रहे अशोक टंडन ने अपनी नई किताब ‘अटल संस्मरण’ में दावा किया है कि डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भीतर एक अलग ही सियासी खिचड़ी पक रही थी। पार्टी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी को राष्ट्रपति भवन भेजने और लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, वाजपेयी ने इस सुझाव को न केवल खारिज कर दिया, बल्कि इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गलत परंपरा की शुरुआत करार दिया।
प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस किताब में अशोक टंडन लिखते हैं कि वाजपेयी इस विचार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। उनका स्पष्ट मानना था कि किसी लोकप्रिय प्रधानमंत्री का केवल बहुमत के दम पर राष्ट्रपति बनना संसदीय लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। वाजपेयी ने तर्क दिया था कि यह एक बेहद गलत नजीर पेश करेगा और वह ऐसे किसी भी कदम का समर्थन करने वाले आखिरी व्यक्ति होंगे। इस प्रस्ताव को ठुकराने के बाद ही वाजपेयी ने राष्ट्रपति पद के लिए आम सहमति बनाने की दिशा में काम शुरू किया और डॉ. कलाम का नाम आगे बढ़ाया।
किताब में उस ऐतिहासिक बैठक का भी जिक्र है जब वाजपेयी ने पहली बार विपक्ष के सामने डॉ. कलाम का नाम रखा था। वाजपेयी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी और डॉ. मनमोहन सिंह को बातचीत के लिए आमंत्रित किया था। बैठक में जब वाजपेयी ने बताया कि एनडीए ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना उम्मीदवार चुना है, तो कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। सोनिया गांधी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि वे इस चयन से हैरान हैं। उन्होंने माना कि उनके पास इस नाम का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, हालांकि उन्होंने अंतिम निर्णय से पहले चर्चा करने की बात कही। अंततः 2002 में कलाम पक्ष और विपक्ष के साझा उम्मीदवार बने।
किताब में वाजपेयी और आडवाणी के रिश्तों की गहराई को भी बयां किया गया है। टंडन लिखते हैं कि तमाम नीतिगत मतभेदों की अफवाहों के बावजूद दोनों नेताओं के संबंध कभी सार्वजनिक रूप से खराब नहीं हुए। आडवाणी हमेशा वाजपेयी को अपना ‘नेता और प्रेरणा स्रोत’ मानते थे, जबकि वाजपेयी उन्हें अपना ‘अटूट साथी’ कहते थे। इसके अलावा, किताब में 2001 के संसद हमले के दौरान का एक भावुक किस्सा भी साझा किया गया है। हमले के वक्त सोनिया गांधी ने फोन करके वाजपेयी की सुरक्षा की चिंता जताई थी, जिस पर वाजपेयी ने जवाब दिया था कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन उन्हें चिंता थी कि कहीं सोनिया गांधी संसद भवन में तो नहीं हैं। यह घटना उस दौर की सियासी शिष्टाचार और मानवीय मूल्यों को दर्शाती है।










