
बृजेश चतुर्वेदी
कन्नौज(BNE) राजकीय मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन निकलने वाला क्विंटलों संक्रमित कचरा खुलेआम ईशन नदी में फेंका जा रहा है। इससे नदी का पानी तो प्रदूषित तो हो ही रहा है तो साथ ही आसपास के गांवों में भी संंक्रमण का खतरा भी उत्पन्न हो गया है। संक्रमण से युक्त कचरे का निस्तारण न होने से यह आसपास के खेतों में भी फैल रहा है, जो फसलाें समेत पर्यावरण के लिए भी घातक है।
डॉ. भीमराव राव आंबेडकर राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय लोगाें के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है। मेडिकल कॉलेज के पास से निकली ईशन नदी में प्रतिदिन संक्रमित कचरा फेंका जा रहा है। इसमें संक्रमित सिरिंज, बैंडेज, गॉज और अन्य चिकित्सीय अपशिष्ट शामिल होते हैं। भारतीय चिकित्सा प्रणाली एवं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के दिशा-निर्देशों के अनुसार बायो मेडिकल वेस्ट को प्लांट में निस्तारित किया जाता है। इस तरह खुले में फेंकने की कोई अनुमति नहीं होती है।
मेडिकल कचरे के निस्तारण के लिए कानपुर और लखनऊ की दो कंपनियों को ठेका दिया गया है, फिर भी मेडिकल कचरे को नदी में खुलेआम फेंका जा रहा है। इससे नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है, जिसे पीने से मवेशी बीमार हो रहे हैं। आगे चलकर यह नदी गंगा में मिल जाती है। इससे अपशिष्ट गंगा में भी पहुंच रहा है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. दिलीप सिंह का कहना है कि राजकीय मेडिकल कॉलेज में बायो मेडिकल वेस्ट के लिए कानपुर की एक कंपनी को ठेका दिया गया है, जबकि सामान्य कूड़े के लिए लखनऊ की एक कंपनी का ठेका है। कंपनी के स्थानीय कर्मचारी खुले में सामान्य कूड़ा फेंक देते हैं जबकि संक्रमित कचरा के लिए कानपुर स्थित प्लांट में जा रहा है। इसकी जांच कराई जाएगी। यदि नदी के किनारे बायो मेडिकल वेस्ट मिला तो कंपनी पर कार्रवाई की जाएगी।
मेडिकल कॉलेज की लापरवाही आई सामने
खुले में बायो मेडिकल वेस्ट फेंकने में राजकीय मेडिकल कॉलेज प्रबंधन की लापरवाही सामने आई है। एनजीटी के दिशा निर्देश पर प्रत्येक अस्पताल में मेडिकल कचरे के निस्तारण की व्यवस्था की गई है, इसके बाद भी कर्मचारी खुले में या नदी में कचरा फेंक रहे हैं। मेडिकल अपशिष्ट में मानव शरीर के विकृत अंग व मांस के टुकड़े भी होते हैं, जिन्हें खाने के लिए जंगली जानवर और कुत्ते भी आ जाते हैं। पानी में फेंकने से वह भी प्रदूषित हो जाता है। ऐसे में नदी में नहाने से शरीर में त्वचा का संक्रमण भी हो जाता है।
ये गांव हो रहे प्रभावित
ईशन नदी के किनारे बसे गांव सिकरोरी, सियापुर, सखौली, फगुहा, नवरंगपुर, हिम्मतपुर, झबरा, नुनारी व चिंतापुरवा समेत कई गांवों के लोग संक्रमण के खतरे से जूझ रहे हैं। इन गांवों के लोगों ने बताया कि प्रतिदिन मेडिकल कॉलेज से ठेकेदार के कर्मचारी बायो मेडिकल वेस्ट को लाकर नदी के पानी में फेंक जाते हैं तो कभी कभार किनारे पलट जाते हैं। इससे भीषण दुर्गंध निकलती है और आसपास खेताें में फसलें भी प्रभावित हो रहीं है।
इस तरह संग्रहित होता बायो मेडिकल वेस्ट
हरा डस्टबिन : सामान्य अपशिष्ट, फलों के छिलके, सब्जियां, खाद्य पदार्थां के पैकेट
लाल डस्टबिन : संक्रमित सिरिंज, दवाइयां, सर्जिकल दस्ताने, खून व मवाद से सनी पट्टी व रूई
पीला डस्टबिन : शरीर के विकृत अंग, मांस के टुकड़े, अंगों के मानव अपशिष्ट
सफेद डस्टबिन : निडिल, ब्लड बैग, सर्जिकल उपकरण ब्लेड, रेजर व अन्य उपकरण
Post Views: 112