
भोजन में बदलाव सूक्ष्मजीवों में विकास का कारण बन सकता है
विजय गर्ग
आइआइटी बाम्बे के शोधकर्ताओं ने पाया है कि सूक्ष्मजीवों के भोजन में मामूली बदलाव भी उन्हें अलग-अलग तरीकों से विकसित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह खोज इस बात को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकती है कि विकास कितना महत्त्वपूर्ण है और इसे औद्योगिक और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। आइआइटी बाम्बे ने सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके प्रयोगशाला में विकास से संबंधित एक अध्ययन किया। रासायनिक इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने दो सूक्ष्मजीवों – सामान्य रूप से आंत में पाये जाने वाले जीवाणु ई कोलाई और बेकिंग सामग्री में इस्तेमाल होने वाले यीस्ट का उपयोग यह पता लगाने के लिए किया कि समान शर्करा का अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करने पर वे कैसे संसाधित और विकसित होते हैं।
शोधकर्ताओं ने सूक्ष्मजीवों के एक समूह को डेयरी उत्पादों में पाए जाने वाले शर्करा, ग्लूकोज और गैलेक्टोज का मिश्रण दिया और दूसरे समूह को उसी ग्लूकोज और गैलेक्टोज से बनी जटिल शर्करा दी, और सूक्ष्मजीवों को लगातार विभाजन के जरिये पनपते रहने दिया। आइआइटी बाम्बे में इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफ़ेसर सुप्रीत सैनी कहते हैं, ‘हमने ऐसी शर्कराएं चुनीं जो रासायनिक असर रखती हैं । हमारा लक्ष्य यह देखना था कि क्या सूक्ष्मजीवों को इस बात की परवाह है कि भोजन कैसे दिया जाता है।’ शोधकर्ताओं ने पाया कि शर्करा की संरचना के आधार पर, सूक्ष्मजीवों का प्रत्येक समूह दो अप्रत्याशित विकासवादी पथों को चुनता है। आनुवंशिक अध्ययन से पता चला कि इसके पीछे कारण कई उत्परिवर्तन हैं। दोनों अध्ययनों की पोस्ट-डाक्टरल शोधकर्ता और लेखिका नीतिका अहलावत ने कहा, ‘हमें उम्मीद नहीं थी कि भोजन और पोषक तत्वों में ये सूक्ष्म अंतर पूरी तरह से अलग नतीजे देंगे। निष्कर्ष बताते हैं कि एक कोशिका पोषक तत्व के प्रति जिस तरह से प्रतिक्रिया करती है, वह इस बात को प्रभावित कर सकता है कि कौन से उत्परिवर्तन लाभदायक हैं और विकास कैसा हो सकता है।’ आश्चर्यजनक रूप से जब शोधकर्ताओं ने ई कोलाई और यीस्ट, दोनों की इन विकसित आबादियों को शर्करा स्रोतों के एक नए समूह में स्थानांतरित किया, तो उनकी वृद्धि एक पूर्वानुमानित पैटर्न के अनुसार हुई। अध्ययन में पाया गया कि हालांकि जिन वातावरणों में ई कोलाई और यीस्ट की नई आबादी तैयार हुई वहां उनका प्रदर्शन अप्रत्याशित था, लेकिन विकास के दुष्प्रभावों का सफलतापूर्वक अनुमान लगाया जा सकता था। आइआइटी बाम्बे की पूर्व पीएचडी छात्रा और ई कोलाई पर अध्ययन की लेखिका पवित्रा वेंकटरमन ने कहा ‘यह उत्साहजनक नतीजा है कि विकास लचीला भी है और सीमित भी । समान वातावरण में परिणाम अप्रत्याशित थे, जो विकास में संभावित लचीलेपन को दर्शाता है।’
अध्ययन में कहा गया है कि निष्कर्षों का बड़े पैमाने पर औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि बेहतर विकास दर और बेहतर चयापचय क्षमता वाले सूक्ष्मजीवों का उपयोग खाद्य और पेय पदार्थ, फार्मास्यूटिकल्स और जैव ईंधन उद्योग जैसे व्यावसायिक अनुप्रयोगों में किया जा सकता है।
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