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दल-बदल विरोधी कानून : स्थिरता की गारंटी या लोकतांत्रिक विवेक पर अंकुश?

News-Editor by News-Editor
June 21, 2026
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दल-बदल विरोधी कानून : स्थिरता की गारंटी या लोकतांत्रिक विवेक पर अंकुश?

– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार केवल नियमित चुनाव नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही, राजनीतिक स्थिरता और जनादेश के प्रति निष्ठा भी है। संसद और विधानसभाएँ जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा इन संस्थाओं की स्थिरता लोकतांत्रिक शासन के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक है। किंतु भारतीय राजनीति में लंबे समय तक दल-बदल की प्रवृत्ति ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी। व्यक्तिगत लाभ, मंत्री पद, आर्थिक प्रलोभन अथवा राजनीतिक अवसरवाद के कारण निर्वाचित प्रतिनिधि बार-बार अपनी निष्ठा बदलते रहे, जिससे सरकारें गिरती रहीं और जनादेश का अपमान होता रहा। इसी समस्या के समाधान के लिए 1985 में संविधान के 52वें संशोधन द्वारा दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य निर्वाचित सदस्यों को राजनीतिक दलों के प्रति अनुशासित बनाए रखना तथा सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करना था।
हालाँकि समय के साथ यह कानून स्वयं बहस का विषय बन गया है। एक पक्ष इसे राजनीतिक भ्रष्टाचार और अवसरवाद के विरुद्ध आवश्यक सुरक्षा कवच मानता है, जबकि दूसरा पक्ष तर्क देता है कि यह सांसदों और विधायकों की स्वतंत्र सोच तथा अंतरात्मा के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है। इस प्रकार दल-बदल विरोधी कानून भारतीय लोकतंत्र में स्थिरता और स्वतंत्रता के बीच संतुलन की जटिल बहस को जन्म देता है।
दल-बदल की समस्या स्वतंत्रता के बाद के दशकों में तेजी से बढ़ी। 1967 के आम चुनावों के बाद अनेक राज्यों में विधायकों ने बड़े पैमाने पर दल बदले। उस समय “आया राम, गया राम” शब्दावली भारतीय राजनीति का प्रतीक बन गई। हरियाणा के विधायक गया लाल द्वारा एक ही दिन में कई बार दल बदलने की घटना ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर किया। इसके परिणामस्वरूप सरकारें अस्थिर हुईं, राजनीतिक नैतिकता कमजोर हुई और जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कम होने लगा। इसी पृष्ठभूमि में दल-बदल को नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस हुई।
दसवीं अनुसूची के अनुसार यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है अथवा मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। स्वतंत्र सदस्य किसी दल में शामिल नहीं हो सकता और मनोनीत सदस्य भी निर्धारित अवधि के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है। अयोग्यता का निर्णय सदन के अध्यक्ष या सभापति द्वारा लिया जाता है।
इस कानून के समर्थकों का तर्क है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में इसकी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सबसे पहले, इसने सरकारों की स्थिरता को मजबूत किया है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि व्यक्तिगत लाभ के लिए बार-बार दल बदलते रहें, तो सरकारें निरंतर संकट में रहेंगी और प्रशासनिक निर्णय प्रभावित होंगे। दल-बदल विरोधी कानून ने इस प्रवृत्ति पर कुछ हद तक अंकुश लगाया है।
दूसरे, यह कानून राजनीतिक भ्रष्टाचार को कम करने का प्रयास करता है। अक्सर दल-बदल मंत्री पद, धन अथवा अन्य लाभों के लिए किया जाता है। ऐसे अवसरवादी व्यवहार से लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुँचती है। कानून का भय कम से कम खुले तौर पर होने वाले राजनीतिक सौदों को सीमित करता है।
तीसरे, यह जनादेश की रक्षा करता है। मतदाता प्रायः किसी उम्मीदवार को उसके दल, विचारधारा और चुनावी घोषणापत्र के आधार पर चुनते हैं। यदि निर्वाचित सदस्य बाद में दल बदल लेता है, तो वह मतदाताओं के विश्वास को ठेस पहुँचाता है। इसलिए दल-बदल विरोधी कानून मतदाताओं की अपेक्षाओं की रक्षा का माध्यम माना जाता है।
चौथे, यह राजनीतिक दलों के भीतर अनुशासन बनाए रखने में सहायक है। संसदीय शासन प्रणाली में सरकार की स्थिरता के लिए यह आवश्यक है कि दल के सदस्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकजुट रहें। यदि प्रत्येक सदस्य अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार मतदान करे, तो सरकार का संचालन कठिन हो सकता है।
इन सकारात्मक पक्षों के बावजूद दल-बदल विरोधी कानून की आलोचना भी व्यापक रूप से होती रही है। सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और अंतरात्मा की स्वतंत्रता को सीमित करता है। संसदीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सांसद और विधायक जनता के प्रतिनिधि हैं, केवल राजनीतिक दलों के एजेंट नहीं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे किसी विधेयक या नीति पर अपने विवेक, अनुभव और जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लें। किंतु व्हिप की बाध्यता के कारण उन्हें दल के निर्देशों का पालन करना पड़ता है, चाहे उनकी व्यक्तिगत राय कुछ भी हो।
यह स्थिति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है। संसद और विधानसभाओं का उद्देश्य केवल सरकार के प्रस्तावों को मंजूरी देना नहीं, बल्कि गहन चर्चा और विचार-विमर्श के माध्यम से बेहतर नीतियों का निर्माण करना है। जब सदस्य स्वतंत्र रूप से मत व्यक्त करने से डरते हैं, तो बहस की गुणवत्ता प्रभावित होती है और विधायिका की भूमिका सीमित हो जाती है।
कानून की दूसरी प्रमुख कमजोरी अध्यक्ष या सभापति की भूमिका से जुड़ी है। अयोग्यता संबंधी निर्णय लेने का अधिकार अध्यक्ष को दिया गया है, जो सामान्यतः किसी राजनीतिक दल से संबंधित होता है। कई मामलों में यह आरोप लगाया गया है कि अध्यक्षों ने राजनीतिक हितों के अनुसार निर्णय लेने में देरी की या पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया। इससे कानून की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
तीसरी आलोचना यह है कि कानून ने दल-बदल को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके स्वरूप को बदल दिया है। पहले व्यक्तिगत स्तर पर दल-बदल होता था, जबकि अब सामूहिक इस्तीफों और पुनर्निर्वाचन के माध्यम से सरकारें गिराई जाती हैं। हाल के वर्षों में कई राज्यों में विधायकों ने पहले इस्तीफा दिया और बाद में दूसरे दल में शामिल होकर पुनः चुनाव लड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि कानून की भावना को दरकिनार करने के नए तरीके खोज लिए गए हैं।
चौथा, यह कानून राजनीतिक दलों के नेतृत्व को अत्यधिक शक्तिशाली बना देता है। दल के शीर्ष नेतृत्व द्वारा जारी व्हिप का पालन करना सदस्यों के लिए अनिवार्य हो जाता है। इससे आंतरिक लोकतंत्र कमजोर पड़ता है और पार्टी के भीतर असहमति व्यक्त करने की गुंजाइश कम हो जाती है। परिणामस्वरूप निर्वाचित प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं की बजाय पार्टी नेतृत्व की प्राथमिकताओं को अधिक महत्व देने लगते हैं।
इन आलोचनाओं को देखते हुए विभिन्न आयोगों और विशेषज्ञों ने सुधारों का सुझाव दिया है। विधि आयोग, राष्ट्रीय संविधान समीक्षा आयोग तथा कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि दल-बदल विरोधी कानून का दायरा सीमित किया जाए। उनका मानना है कि व्हिप केवल उन मामलों में लागू होना चाहिए जो सरकार के अस्तित्व से सीधे जुड़े हों, जैसे विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, विनियोग विधेयक या अन्य महत्वपूर्ण वित्तीय विषय। सामान्य विधायी मामलों में सदस्यों को स्वतंत्र रूप से मतदान करने की अनुमति मिलनी चाहिए।
इसी प्रकार अयोग्यता संबंधी निर्णय अध्यक्ष के बजाय किसी स्वतंत्र न्यायिक प्राधिकरण अथवा निर्वाचन आयोग को सौंपने का सुझाव भी दिया गया है। इससे निष्पक्षता और पारदर्शिता बढ़ सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई मामलों में निर्णय प्रक्रिया में अनावश्यक देरी पर चिंता व्यक्त की है और समयबद्ध निपटान की आवश्यकता पर बल दिया है।
अन्य लोकतांत्रिक देशों का अनुभव भी इस बहस को रोचक बनाता है। ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे संसदीय लोकतंत्रों में दलगत अनुशासन तो है, किंतु भारत जैसी कठोर अयोग्यता व्यवस्था नहीं है। वहाँ सांसद कई बार पार्टी लाइन से अलग मतदान करते हैं, फिर भी उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होती। इससे संसदीय बहस अधिक स्वतंत्र और जीवंत बनी रहती है। दूसरी ओर भारत जैसी विविधतापूर्ण और गठबंधन-प्रधान राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक अस्थिरता की आशंका अधिक रहती है, इसलिए यहाँ कुछ प्रकार के नियमन की आवश्यकता को भी नकारा नहीं जा सकता।
वर्तमान परिस्थितियों में यह स्पष्ट है कि दल-बदल विरोधी कानून को पूरी तरह समाप्त करना व्यावहारिक समाधान नहीं होगा। भारत ने अतीत में अवसरवादी राजनीति और अस्थिर सरकारों के दुष्परिणाम देखे हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र केवल स्थिरता का नाम नहीं है; यह विचारों की स्वतंत्रता, असहमति और विवेकपूर्ण निर्णय की संस्कृति पर भी आधारित है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि केवल पार्टी नेतृत्व के निर्देशों का पालन करने तक सीमित हो जाएँ, तो संसद और विधानसभाएँ लोकतांत्रिक विमर्श के मंच के बजाय औपचारिक संस्थाएँ बनकर रह जाएँगी।
इसलिए आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की है। दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक भ्रष्टाचार और अवसरवाद को रोकना होना चाहिए, न कि वैचारिक बहस और लोकतांत्रिक असहमति को दबाना। व्हिप की अनिवार्यता को सीमित करना, निर्णय प्रक्रिया को स्वतंत्र बनाना, राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना तथा जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को मजबूत करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
अंततः दल-बदल विरोधी कानून भारतीय लोकतंत्र की एक ऐसी व्यवस्था है जिसने राजनीतिक स्थिरता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, किंतु इसके वर्तमान स्वरूप में कई लोकतांत्रिक चुनौतियाँ भी निहित हैं। लोकतंत्र की सफलता स्थिर सरकार और स्वतंत्र विचार, दोनों के संतुलन पर निर्भर करती है। इसलिए कानून में ऐसे सुधार आवश्यक हैं जो एक ओर जनादेश की रक्षा करें और दूसरी ओर निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने विवेक और जनता के हित में बोलने तथा निर्णय लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता भी प्रदान करें। यही संतुलन भारतीय संसदीय लोकतंत्र को अधिक परिपक्व, उत्तरदायी और सशक्त बना सकता है।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
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