
पुस्तक मेलों में अब पहले जैसे भीड़ उमड़ती नहीं दिखती
विजय गर्ग
जीवन में परिवर्तन अच्छा लगता है, लेकिन परिवर्तन का तात्पर्य यह नहीं कि हम अपनी संस्कृति को ही दरकिनार कर दें। कुछ ऐसा ही हमारा पुस्तकों के प्रति लगाव को देखा जा रहा है। खासकर युवा पीढ़ी और पुस्तक संस्कृति के बीच दूरियां काफी चिंता का विषय बन गई है। आज के युवाओं के बीच पुस्तकों के प्रति लगाव कम होने का मुख्य कारण डिजिटल दुनिया है, जहां स्मार्टफोन या मोबाइल या कंप्यूटर के स्क्रीन पर एक क्लिक के साथ किसी को हर तरह की सामग्री मिल जाती है। मगर सब कुछ व्यापक उपलब्धता के बीच पुस्तकों की जगह दिनों-दिन सिकुड़ती जा रही है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पुस्तकों से युवा पीढ़ी का जुड़ाव कम होना न केवल युवा पीढ़ी के ज्ञान और रचनात्मकता को प्रभावित करती है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और
साहित्य के संरक्षण पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। समय रहते इस विषय पर गौर करना बेहद महत्त्वपूर्ण है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल मीडिया हमारे लिए बेहद अहम बनता जा रहा है, लेकिन किताबों से इसकी तुलना करना व्यर्थ है। एक पुस्तक हमारे दिमाग के विकास के लिए बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि जब हम किताब पढ़ते हैं, तो इससे हमारे दिमाग में एकाग्रता का विकास होता है और इसके साथ ही हमारे ज्ञान की गहराई में इजाफा होता है।
आज की दौड़ती भागती जिंदगी में युवा पीढ़ी के पास इतना समय ही नहीं है कि वह अपने इतिहास और विचार-गहनता की सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के लिए उन पर गहन अध्ययन को प्राथमिक और जरूरी माने।
पुस्तक मेलों की चमक यह बेवजह नहीं है कि पुस्तक मेलों में अब पहले जैसे भीड़ उमड़ती नहीं दिखती है। एक समय था, जब युवा पीढ़ी को इंतजार रहता था कि कब पुस्तक मेला लगे और वे अपनी पसंद की किताबें खरीद कर लाएं। अब तक किताबें ही मार्गदर्शन के साथ हमारा समय बिताने की साथी रही थीं। आज का युवा किताबों को ई-बुक पर पढ़ना चाहता है, ताकि आधुनिक होने का अहसास हो। मगर क्या हमें लगता है कि किताब को बिना स्पर्श किए वह अनुभूति हो सकती है जो हाथ में किताब लेकर पढ़ने में मिलती है ?
दरअसल, किताब वह अहसास है जो जानकारियों और जिज्ञाआसों से बांधे रखता है। आज युवाओं के बीच नकारात्मकता इस कदर घर करती जा रही है कि इसकी वजह से ध्यान सही जगह पर इस्तेमाल नहीं हो रही। किताबें हम अक्सर उस समय पढ़ते हैं, जब हमें महसूस होता है कि खाली समय है या फिर अकेलापन महसूस हो रहा है। ऐसी स्थिति में किताबें किसी दोस्त की तरह काम करती हैं। उनको पढ़कर एक अलग-सी शांति मिलती है। जहां हम तनाव महसूस करते हैं, वहां किताबें हमारे अंदर से तनाव को निकालकर दिमाग में सकारात्मकता और जीवन जीने की इच्छा को भर देती हैं। एक समय था जब किसी जगह पुस्तकालय मिल जाता था तो एक उत्सुकता होती थी वहां बैठ कर किताबे पढ़ने की पुस्तकालयों में पुस्तकों का इतना अधिक संग्रह होता था कि हमारे अंदर उन्हें पढ़ने की भी अलग-सी ललक होती थी। वहां हमें अपनी संस्कृति और विरासत की झलक दिखाई देती थी। मगर आज युवा पीढ़ी के किताबों के प्रति अनदेखी करने वाले रवैए ने पुस्तकालयों को जैसे विलुप्त ही कर दिया है। आज के युवा इस कदर व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास समय नहीं है कि वे किताबों के लिए पुस्तकालय जैसी जगह पर जाएं।
बढ़ती होड़
मुश्किल यह है कि आज युवा पीढ़ी में एक दूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा खड़ी हो गई है, जो उन्हें दिन-रात चैन से जीने नहीं देती है। खासकर माता-पिता की इच्छाएं युवाओं पर एक बोझ की तरह काम करने लगी हैं। उन्हें भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए शिक्षा में ‘सबसे अव्वल’ आने को अपना लक्ष्य बनाना है। इस क्रम में सिर पर पढ़ाई इस कदर हावी हो रही है कि युवाओं के पास समय की बेहद कमी होती जा रही है और वे अपने पाठ्यक्रम से अलग ज्ञान और सृजनात्मक साहित्य की पुस्तकें नहीं पढ़ पाते। जीवन में जो पुस्तकें हमें असल में वास्तविकता को दिखाती हैं, अगर उन्हें खरीदा भी जाता है तो अलमारी में सजा कर रखने के लिए।
यह एक विचित्र विडंबना है कि डिजिटल मंचों पर किसी भी चीज को खोज कर हमें विश्वास हो जाता है कि वह सही ही होगी, लेकिन इसके विपरित एक किताब को हम नहीं पढ़ना चाहते, जिसे किसी लेखक ने अपने अनुभवों से सींचा होगा, बड़ी मेहनत से लिखा होगा और उसमें वास्तविकता दर्ज होगी। क्या हमने कभी सोचा है कि हम गूगल में खोज कर जो चीजें हासिल करते हैं, उनकी विश्वसनीयता कितनी होती है ? हम इस ओर ज्यादा गौर नहीं करते है, क्योंकि हमें सिर्फ पकी पकाई सामग्री चाहिए होती है। यहां युवाओं को समझना होगा कि अगर उन्हें ज्ञान से लैस जागरूक नागरिक बनना है, तो जरूरी है कि वे पुस्तकों से दूरी न बनाएं। उनमें विषयों को खोजें। जो गुणवत्ता से लैस जानकारी पुस्तकों में मिलेगी, उसकी तुलना डिजिटल मंचों पर बिखरी हुई सामग्री में नहीं मिलेगी। बुद्धिमत्ता का विकास
किताबें नियमित रूप से पढ़ने से याददाश्त में बढ़ोतरी होती है। साथ ही इससे तनाव से मुक्ति और स्फूर्ति भी मिलती है। अगर किताबों को ध्यान से पढ़ा जाए तो विषय की गहरी समझ पैदा होती है। साथ ही किताबें भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सहानुभूति विकसित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पुस्तकें ज्ञान, कल्पना और रचनात्मकता का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। वे हमें विभिन्न संस्कृतियों और विचारों के बारे में जानने में मदद करती हैं और हमें दुनिया को एक अलग दृष्टिकोण से देखने में सक्षम बनाती हैं। जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव को हम किताबों के जरिए भी जान पाते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अगर हम रात को सोने से पहले किताब पढ़ते हैं तो हमें बेहद सुकून भरी नींद आती है। पूरे दिन में पुस्तक पढ़ने का समय नहीं है तो रात को सोते समय मोबाइल पर वक्त बिताने से अच्छा है कोई किताब पढ़ी जाए। जिस दिन हमने पुस्तक को अपनी धरोहर की तरह संभाल कर उसे पढ़ना शुरू कर दिया, तो जीवन के सारे अवसाद स्वयं ही खत्म होते दिखेंगे। अच्छी नींद के साथ सुबह मन खुशनुमा महसूस करेगा।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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