चमत्कारों के बाजार में वैज्ञानिक चेतना की तलाश
आस्था निजी विश्वास है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य तर्क, प्रमाण, शोध और नवाचार से तय होता है
– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत की शक्ति उसकी आस्था में ही नहीं, उसकी ज्ञान-परंपरा में भी रही है। समस्या पूजा, प्रार्थना या धार्मिक विश्वास में नहीं, बल्कि तब पैदा होती है जब चमत्कार को प्रमाण और अंधविश्वास को विवेक का विकल्प बना दिया जाता है। ज्योतिष, हस्तरेखा, भविष्यवाणी, तंत्र-मंत्र अथवा चमत्कारों के दावों के पीछे समाज की असुरक्षा और अनिश्चितता भी काम करती है। ऐसे समय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने और प्रमाण खोजने की आदत विकसित करना है। बच्चों को केवल उत्तर याद कराने के बजाय सवाल करना सिखाना होगा। मंदिरों के साथ प्रयोगशालाएँ, आस्था के साथ विवेक और परंपरा के साथ वैज्ञानिक चेतना ही आधुनिक भारत की वास्तविक आवश्यकता है।
आज के भारत में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर देश अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल तकनीक, चिकित्सा, जैव-प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, दूसरी ओर समाज के अनेक हिस्सों में चमत्कार, भविष्यवाणी, ज्योतिष, हस्तरेखा, तंत्र-मंत्र और तथाकथित दैवीय शक्तियों के दावों का आकर्षण बना हुआ है। समय-समय पर नए धार्मिक स्थल, आध्यात्मिक केंद्र और लोकप्रिय संत चर्चा में आते हैं। कोई धाम श्रद्धा का केंद्र बनता है तो किसी कथावाचक या संत के अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़ती है। यह केवल धर्म का विषय नहीं, बल्कि समाज की मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक प्रवृत्तियों को समझने का विषय भी है।
व्यंग्य में कहा जा सकता है कि हमारे यहाँ समय-समय पर नए-नए ‘भगवान’ लोकप्रिय हो जाते हैं। लेकिन इस व्यंग्य के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है—आखिर लोगों को चमत्कारों और अलौकिक दावों में इतना आकर्षण क्यों दिखाई देता है?
मनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु होने के साथ-साथ अनिश्चितताओं से भयभीत भी होता है। बीमारी, बेरोजगारी, विवाह, संतान, परीक्षा, नौकरी, आर्थिक संकट और भविष्य की चिंता उसे ऐसे उत्तरों की तलाश में ले जाती है जो तत्काल आश्वासन दे सकें। विज्ञान कई बार किसी समस्या का उत्तर खोजने में समय लेता है। इसके विपरीत कोई व्यक्ति यदि कुछ मिनटों में भविष्य बताने, बीमारी का कारण समझाने या समस्या के समाधान का दावा कर दे, तो संकट में घिरा व्यक्ति उसकी ओर आकर्षित हो सकता है। यही वह मनोवैज्ञानिक जमीन है, जहाँ अंधविश्वास का बाजार तैयार होता है।
भारत में हाथ की रेखा देखकर भविष्य बताने वाले, विवाह और करियर की भविष्यवाणी करने वाले, ग्रह-दशा के आधार पर जीवन की दिशा तय करने वाले और चमत्कारों के दावे करने वाले अनेक लोग लोकप्रिय होते रहे हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और व्यापक बना दिया है। पहले किसी दावे को सीमित क्षेत्र के लोग सुनते थे; अब एक वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। दृश्य प्रभाव, भावनात्मक भाषा और व्यक्तिगत अनुभवों की कहानियाँ किसी दावे को प्रमाण जैसा बना सकती हैं, जबकि व्यक्तिगत अनुभव वैज्ञानिक प्रमाण के समान नहीं होता।
यहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जरूरत सामने आती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति पूजा न करे, मंदिर न जाए या अपनी धार्मिक मान्यताओं को छोड़ दे। आस्था निजी जीवन का विषय है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने विश्वास का अधिकार है। लेकिन किसी प्राकृतिक घटना, बीमारी, उपचार या चमत्कार संबंधी दावे को केवल श्रद्धा के आधार पर सत्य मान लेना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहता है—प्रश्न पूछिए, प्रमाण देखिए, परीक्षण कीजिए और यदि प्रमाण बदलें तो अपनी धारणा बदलने के लिए भी तैयार रहिए।
भारतीय ज्ञान-परंपरा स्वयं प्रश्न और जिज्ञासा से भरी रही है। आर्यभट से लेकर आधुनिक भारतीय वैज्ञानिकों तक हमारी परंपरा ने गणित, खगोल विज्ञान, भौतिकी, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज भी भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ विश्वभर में अपनी क्षमता का परिचय दे रहे हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत वैज्ञानिक सोच से अपरिचित देश है। असली चुनौती यह है कि वैज्ञानिक चेतना समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितनी गहराई से पहुँच रही है।
दुनिया के तकनीकी विकास को देखें तो जीपीएस, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, यूट्यूब, फेसबुक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों के पीछे वर्षों का शोध, प्रयोग, निवेश और असफलताओं से सीखने की प्रक्रिया रही है। इनका निर्माण किसी चमत्कार के दावे से नहीं, बल्कि समस्या को पहचानने, सवाल पूछने, प्रयोग करने और समाधान विकसित करने से हुआ। भारत में भी ऐसी प्रतिभा मौजूद है। प्रश्न यह है कि हम उस प्रतिभा को किस दिशा में प्रेरित कर रहे हैं?
हमारे विद्यालयों की भूमिका यहाँ सबसे महत्वपूर्ण है। यदि बच्चे को हर प्रश्न का उत्तर केवल परंपरा के हवाले से दिया जाएगा, तो उसकी जिज्ञासा सीमित हो सकती है। यदि उसे कहा जाएगा कि प्रश्न पूछो, प्रमाण खोजो और स्वयं जाँचो, तो वही बच्चा भविष्य में शोधकर्ता, वैज्ञानिक, चिकित्सक, इंजीनियर या नवाचारी उद्यमी बन सकता है।
वैज्ञानिक चेतना विकसित करने के लिए परिवार, विद्यालय, मीडिया और सामाजिक संस्थाओं—सभी को अपनी भूमिका समझनी होगी। मीडिया को चमत्कार के दावों को सनसनी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके तथ्यात्मक पक्ष की जाँच करनी चाहिए। विद्यालयों में प्रयोग आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। परिवारों में बच्चों के प्रश्नों को दबाने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। सोशल मीडिया पर किसी वीडियो को देखकर तुरंत विश्वास करने के बजाय उसके स्रोत और प्रमाण की पड़ताल करने की आदत विकसित करनी होगी।
यह भी समझना होगा कि अंधविश्वास केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अफवाहों पर विश्वास, बिना प्रमाण किसी व्यक्ति को विशेषज्ञ मान लेना, सोशल मीडिया की हर जानकारी को सत्य समझ लेना और बिना वैज्ञानिक आधार के स्वास्थ्य संबंधी दावों पर भरोसा करना भी उसी समस्या के अलग-अलग रूप हैं।
भारत को किसी की आस्था छीनने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है विवेक को मजबूत करने की। हमें ऐसा समाज चाहिए जहाँ मंदिर हों तो प्रयोगशालाएँ भी हों, प्रार्थना हो तो शोध भी हो, परंपरा हो तो प्रश्न भी हों और विश्वास हो तो प्रमाण का सम्मान भी हो।
आने वाली पीढ़ी के सामने हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य किसी नए चमत्कार की खोज नहीं, बल्कि नए प्रश्नों की खोज होना चाहिए। ऐसा भारत, जहाँ बच्चे यह न पूछें कि “चमत्कार कैसे हो गया?”, बल्कि यह पूछने का साहस रखें—“इस दावे का प्रमाण क्या है?”
किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल उसके धार्मिक स्थलों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, शोध संस्थानों और नवाचार केंद्रों से भी दिखाई देती है।
आस्था रहे, लेकिन विवेक के साथ।
विश्वास रहे, लेकिन प्रश्नों के लिए जगह के साथ।
परंपरा रहे, लेकिन वैज्ञानिक चेतना के साथ।
क्योंकि राष्ट्र का भविष्य चमत्कारों से नहीं, ज्ञान, तर्क, शोध और मानवीय विवेक से निर्मित होता है।