दौलत की फाइलें, भरोसे के सवाल
(अधिकारियों की संपत्ति के खुलासे ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ी)
– डॉ. प्रियंका सौरभ
हरियाणा के आईपीएस अधिकारियों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। जब जनता के सामने यह तथ्य आते हैं कि कानून-व्यवस्था संभालने वाले कई वरिष्ठ अधिकारियों के पास करोड़ों रुपये की संपत्ति है—जमीन, प्लॉट, मकान, फार्महाउस या अन्य निवेश—तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में जिज्ञासा और सवाल दोनों पैदा होते हैं। यह सवाल केवल आंकड़ों का नहीं होता, बल्कि उस भरोसे का होता है जो जनता प्रशासन और शासन पर करती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी पद केवल अधिकार का प्रतीक नहीं होता, बल्कि वह जिम्मेदारी और नैतिक आचरण का भी प्रतीक होता है। विशेष रूप से पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी राज्य की शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे कानून लागू करते हैं, अपराध पर नियंत्रण रखते हैं और आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा करते हैं। ऐसे में जब उनकी आर्थिक स्थिति चर्चा का विषय बनती है, तो जनता यह समझना चाहती है कि यह संपत्ति किस प्रकार अर्जित हुई, क्या यह पूरी तरह वैधानिक है, और क्या इस पर निगरानी की कोई प्रभावी व्यवस्था मौजूद है।
संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करना निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है। इससे शासन की पारदर्शिता बढ़ती है और नागरिकों को यह अधिकार मिलता है कि वे सत्ता से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत भी यही है कि सत्ता जनता से छिपी हुई नहीं होनी चाहिए। भारत में कई वर्षों से यह परंपरा रही है कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारी अपनी चल-अचल संपत्ति का विवरण सरकार को देते हैं। लेकिन जब यह जानकारी सार्वजनिक होती है, तब उसका महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि तब समाज स्वयं भी उस पर नजर रख सकता है।
हालाँकि, केवल आंकड़े सामने आ जाने से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। असली प्रश्न यह है कि क्या इन विवरणों की गंभीरता से जांच भी होती है? क्या यह सुनिश्चित किया जाता है कि घोषित संपत्ति वास्तविकता से मेल खाती है? क्या आय के स्रोत पूरी तरह स्पष्ट हैं? यदि यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाए तो पारदर्शिता का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। पारदर्शिता तभी सार्थक होती है जब उसके साथ जवाबदेही भी जुड़ी हो।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सरकारी सेवाओं में काम करने वाले सभी अधिकारियों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। देश में अनेक ऐसे अधिकारी हैं जिन्होंने ईमानदारी, सादगी और सेवा भावना की मिसाल कायम की है। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया। कई अधिकारी ऐसे भी हैं जो वर्षों तक दूर-दराज के क्षेत्रों में काम करते हैं और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। इसलिए किसी भी चर्चा को संतुलित दृष्टि से देखना आवश्यक है। कुछ मामलों के आधार पर पूरे तंत्र को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि पिछले कुछ दशकों में प्रशासनिक तंत्र को लेकर जनता के मन में संदेह बढ़ा है। भ्रष्टाचार के कई मामलों ने लोगों का भरोसा कमजोर किया है। जब आम नागरिक रोजमर्रा के कामों के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाता है, रिश्वत की शिकायतें सुनता है या व्यवस्था की जटिलताओं से जूझता है, तो उसके मन में यह भावना पैदा होती है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। ऐसे माहौल में जब बड़े पैमाने पर संपत्तियों की खबर सामने आती है, तो संदेह और गहरा हो जाता है।
यही कारण है कि संपत्ति के खुलासे को केवल समाचार की तरह देखने के बजाय इसे व्यवस्था को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। सरकार और संबंधित संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संपत्ति घोषणाओं की नियमित और स्वतंत्र जांच हो। यदि कहीं कोई विसंगति पाई जाती है तो उस पर निष्पक्ष कार्रवाई भी हो। इससे ईमानदार अधिकारियों का मनोबल भी बढ़ेगा और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए स्पष्ट संदेश भी जाएगा।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रशासनिक तंत्र में नैतिक मूल्यों को मजबूत किया जाए। कानून और नियम जरूरी हैं, लेकिन केवल नियमों के सहारे पूरी व्यवस्था नहीं चलती। अधिकारियों के भीतर सेवा की भावना, जिम्मेदारी का एहसास और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति उच्च पद पर पहुँचता है तो समाज उससे सामान्य नागरिक की तुलना में अधिक अपेक्षाएँ रखता है। यह अपेक्षा केवल कार्यकुशलता की नहीं बल्कि चरित्र और आचरण की भी होती है।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। समाचार पत्रों और अन्य माध्यमों का दायित्व है कि वे तथ्यों को सामने लाएँ, लेकिन साथ ही जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करें। किसी भी खबर को सनसनी बनाने के बजाय उसके व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भ को समझना भी जरूरी है। मीडिया यदि संतुलित और तथ्यपूर्ण चर्चा को आगे बढ़ाएगा तो समाज में स्वस्थ बहस का माहौल बनेगा।
साथ ही नागरिक समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लोकतंत्र केवल सरकार या अधिकारियों से नहीं चलता; इसमें जनता की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी होती है। यदि नागरिक जागरूक होंगे, सवाल पूछेंगे और पारदर्शिता की मांग करेंगे तो व्यवस्था स्वाभाविक रूप से अधिक उत्तरदायी बनेगी। सूचना का अधिकार जैसे कानून इसी सोच का परिणाम हैं, जिन्होंने शासन को अधिक खुला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह भी विचार करने योग्य है कि आज के समय में सरकारी सेवाओं में काम करने वाले अधिकारियों के सामने भी कई चुनौतियाँ हैं। लगातार बढ़ती अपेक्षाएँ, राजनीतिक दबाव, प्रशासनिक जटिलताएँ और सामाजिक परिवर्तन—इन सबके बीच काम करना आसान नहीं होता। इसलिए व्यवस्था को केवल आलोचना के दृष्टिकोण से देखने के बजाय सुधार के दृष्टिकोण से देखना अधिक उपयोगी होगा। यदि प्रशासन को मजबूत बनाना है तो उसे पारदर्शिता, प्रशिक्षण, तकनीकी सुधार और नैतिक नेतृत्व—इन सभी पहलुओं पर एक साथ ध्यान देना होगा।
डिजिटल युग में पारदर्शिता की संभावनाएँ और बढ़ गई हैं। यदि संपत्ति विवरण, प्रशासनिक निर्णय और वित्तीय प्रक्रियाएँ अधिक व्यवस्थित रूप से ऑनलाइन उपलब्ध हों तो भ्रष्टाचार की संभावनाएँ कम हो सकती हैं। कई देशों में यह व्यवस्था काफी प्रभावी साबित हुई है। भारत में भी इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र का आधार केवल कानून नहीं बल्कि विश्वास होता है। जनता का विश्वास ही सरकार और प्रशासन को वैधता देता है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है तो व्यवस्था की नींव भी कमजोर हो जाती है। इसलिए हर वह कदम जो पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करता है, वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करता है।
हरियाणा के आईपीएस अधिकारियों की संपत्ति का मुद्दा भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह केवल कुछ नामों या आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते का आईना है जो जनता और प्रशासन के बीच मौजूद है। यदि इस अवसर का उपयोग व्यवस्था को और पारदर्शी, जवाबदेह और नैतिक बनाने के लिए किया जाए, तो यह खबर केवल चर्चा का विषय नहीं बल्कि सकारात्मक बदलाव की शुरुआत भी बन सकती है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना गलत नहीं होता; बल्कि वही व्यवस्था को जीवित रखता है। जरूरी यह है कि सवालों का जवाब भी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ दिया जाए। तभी जनता का भरोसा मजबूत होगा।