शोर में डूबती सड़कें, बेकाबू बीट्स, बेहाल समाज
(तेज डीजे, बिगड़ता ट्रैफिक और समाज पर बढ़ता मानसिक दबाव)
– डॉ. प्रियंका सौरभ
सड़कें मूलतः लोगों और वाहनों के सुरक्षित तथा सुगम आवागमन के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नई प्रवृत्ति ने इस मूल उद्देश्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह प्रवृत्ति है—मोबाइल डीजे और अत्यधिक तेज ध्वनि के साथ सड़कों पर निकलने वाले वाहन। शादी-ब्याह, जुलूस और विभिन्न आयोजनों के नाम पर चलने वाले ये डीजे अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गए हैं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में अव्यवस्था और असुविधा का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं। 100 से 120 डेसिबल तक की ध्वनि, जो इन डीजे सिस्टम से निकलती है, न केवल कानों के लिए हानिकारक है, बल्कि सड़क सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा उत्पन्न करती है। जब इतना तेज शोर आसपास गूंज रहा होता है, तो पीछे से आने वाले वाहन का हॉर्न तक सुनाई नहीं देता, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।
ध्वनि प्रदूषण को अक्सर हम उतनी गंभीरता से नहीं लेते, जितनी अन्य प्रकार के प्रदूषण को, जबकि इसका प्रभाव सीधे हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। अत्यधिक तेज आवाज अस्थायी बहरेपन, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और लंबे समय में स्थायी श्रवण क्षति तक का कारण बन सकती है। सड़कों पर जब ये मोबाइल डीजे गुजरते हैं, तो राहगीर, दुकानदार, बुजुर्ग और बच्चे सभी इससे प्रभावित होते हैं। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब ये वाहन उन क्षेत्रों से गुजरते हैं जहाँ शांति की सबसे अधिक आवश्यकता होती है—जैसे स्कूल, अस्पताल और लाइब्रेरी। एक कक्षा में पढ़ रहे बच्चों का ध्यान अचानक भंग हो जाना, अस्पताल में भर्ती मरीजों की नींद और आराम में बाधा आना, या लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्रों की एकाग्रता टूट जाना—ये सब केवल असुविधा नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे पर पड़ने वाला सीधा प्रभाव है।
तेज डीजे का असर केवल शारीरिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करता है। अक्सर देखा गया है कि ऐसे आयोजनों में, जहाँ तेज संगीत और भीड़ का माहौल होता है, वहाँ लोग सामान्य बातचीत तक नहीं कर पाते। संवाद की कमी और ध्वनि की तीव्रता मिलकर एक ऐसा वातावरण तैयार करती है, जिसमें छोटी-छोटी बातों पर विवाद होने लगते हैं। जब इसमें नशे का तत्व जुड़ जाता है, तो स्थिति और भी जटिल हो जाती है। कई बार ये विवाद झगड़े, पुलिस शिकायतों और हिंसा तक पहुँच जाते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि अत्यधिक तेज संगीत और नशा मिलकर एक ऐसा उत्तेजक माहौल बनाते हैं, जो लोगों के व्यवहार को असामान्य और आक्रामक बना सकता है।
कानून के स्तर पर देखें तो ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम मौजूद हैं। विभिन्न क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा तय की गई है, और रात के समय लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध भी है। स्कूलों, अस्पतालों और अन्य संवेदनशील स्थानों के आसपास तो विशेष रूप से साइलेंस ज़ोन घोषित किए गए हैं। इसके बावजूद, मोबाइल डीजे का खुलेआम इन नियमों का उल्लंघन करना एक सामान्य बात बन गई है। कई बार प्रशासनिक लापरवाही या सामाजिक दबाव के कारण इन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। इससे यह संदेश जाता है कि नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, और उनका पालन करना आवश्यक नहीं है।
इस पूरे मुद्दे में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि लोग इसे अपने “मनोरंजन का अधिकार” मानते हैं। निश्चित रूप से हर व्यक्ति को अपने जीवन के खुशी के अवसरों को मनाने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार तब तक ही उचित है, जब तक वह दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन न करे। जब किसी का उत्सव दूसरे की शांति, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए समस्या बन जाए, तो वहाँ संतुलन आवश्यक हो जाता है। सड़कें सार्वजनिक स्थान हैं, और उनका उपयोग इस तरह होना चाहिए कि सभी को समान रूप से सुविधा मिल सके।
समाधान केवल सख्त प्रतिबंधों में नहीं छिपा है, बल्कि हमारी सोच और व्यवहार में बदलाव में भी है। तकनीकी रूप से ऐसे साउंड सिस्टम उपलब्ध हैं, जिनमें ध्वनि की सीमा को नियंत्रित किया जा सकता है। आयोजकों को ऐसे उपकरणों के उपयोग के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अनुमति प्रणाली को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाना आवश्यक है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी आयोजन निर्धारित नियमों के भीतर ही हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए, ताकि वे यह समझ सकें कि अत्यधिक शोर केवल दूसरों के लिए ही नहीं, बल्कि उनके अपने स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक है।
सांस्कृतिक स्तर पर भी बदलाव की आवश्यकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि उत्सव का अर्थ केवल शोर और दिखावा नहीं होता। सच्ची खुशी वह होती है, जिसमें सभी लोग सहज और संतुलित रूप से शामिल हो सकें। “जितना तेज, उतना बेहतर” की मानसिकता को बदलना होगा। बच्चों और युवाओं के लिए भी यह एक सीखने का विषय है। वे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि वे यह देखेंगे कि नियमों का पालन करना और दूसरों की सुविधा का ध्यान रखना सामान्य बात है, तो वे भी उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे।
अंततः यह समस्या केवल प्रशासन या कानून की नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी की है। मोबाइल डीजे और अत्यधिक शोर का मुद्दा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने अधिकारों का उपयोग किस तरह कर रहे हैं और क्या हम दूसरों के अधिकारों का सम्मान कर रहे हैं। एक सभ्य समाज की पहचान केवल उसके उत्सवों से नहीं, बल्कि उन उत्सवों को मनाने के तरीके से होती है। यदि हम सच में एक शांत, सुरक्षित और संवेदनशील समाज की कल्पना करते हैं, तो हमें अपने व्यवहार में संयम और जिम्मेदारी को स्थान देना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं, जब हमारी ही बनाई हुई शोरगुल की दुनिया हमारे लिए असहनीय बन जाएगी।