भारतीय चेतना, श्रद्धा विश्वास और समर्पण का प्रतीक है-रक्षाबंधन का पर्व !
यह दिन गुरु-शिष्य परंपरा को सम्मान देने का दिन होता है। इस दिन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लोग यज्ञोपवीत (जनेऊ) का नवीकरण करते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि इस दिन ऋषियों के संरक्षण के लिए रक्षा-सूत्र बांधा जाता था, जो बाद में रक्षाबंधन के रूप में लोकप्रिय हुआ। पुरोहित आज भी इस दिन यजमानों को ‘रक्षा-सूत्र’ (मौली) बांधते हैं और वेद मंत्रों से उनकी रक्षा की कामना करते हैं। इस त्योहार (उत्सव) को मनाने के पीछे एक मान्यता यह भी है कि समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों के संघर्ष में, इंद्राणी (इंद्र की पत्नी) ने इंद्र को एक रक्षा-सूत्र बांधा था, जिससे उन्हें विजय प्राप्त हुई थी। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस दिन ऋषियों को स्मरण करते हुए ऋषि-तर्पण भी किया जाता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि इस पर्व का ‘श्रावणी’ नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि इस दिन ‘श्रवण नक्षत्र’ में पूर्णिमा का संयोग होता है। घरों में इस दिन इस नक्षत्र की पूजा की जाती है। वैदिक काल से ही इस दिन को विशेष रूप से उपाकर्म संस्कार के लिए पवित्र माना गया है। उपाकर्म का अर्थ होता है- ज्ञान, तप और जीवन की एक नई शुरुआत। जैसा कि ऊपर जानकारी दे चुका हूं कि इस दिन ब्राह्मण पुरोहित पवित्र नदियों या तीर्थों में स्नान कर तर्पण करते हैं, संकल्प लेते हैं और नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। वैसे,श्रावणी पूर्णिमा का एक रूप ‘संस्कृत दिवस’ भी है। संस्कृत प्राचीनतम भाषा और सभी भाषाओं की जननी मानी जाती है। हालांकि, संस्कृत केवल एक भाषा मात्र ही नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीनतम सनातन संस्कृति और ज्ञान परंपरा का मेरुदंड है। यह हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष और योग की भी भाषा है। सच तो यह है कि संस्कृत में संपूर्ण जीवनदर्शन समाहित है। बहरहाल, रक्षाबंधन ऐसा पर्व है जो परिवारों को आपस में जोड़ता है।यह रिश्तों को मजबूत करता है, रिश्तों को संबल देता है। सच तो यह है कि यह पर्व (रक्षाबंधन) प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व ‘भाई दूज'(दीपावली पर आने वाले त्योहार) से भी जुड़ता है। इस पर्व का आध्यात्मिक, धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व है। बुज़ुर्ग बताते हैं कि कई क्षेत्रों में तो इस दिन आज भी किसान अपने खेतों की मेड़ पर रक्षा सूत्र बाँधते हैं और अच्छी फसल की ईश्वर से कामना करते हैं। सामाजिक समरसता और परस्पर सहयोग का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व सुरक्षा और कर्तव्य बोध का सामाजिक संदेश भी देता है। आधुनिक समय में यह पर्व मित्रता, राष्ट्र सेवा, और नारी सशक्तीकरण का प्रतीक भी माना जाने लगा है। अंत में यही कहूंगा कि
यह पर्व हमें यह सिखाता है कि रिश्तों की रक्षा करना, उन रिश्तों को सम्मान देना और प्रेम से जुड़ना हमारी सनातन भारतीय संस्कृति और हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अहम व मुख्य हिस्सा है। श्रावणी पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का पर्व है। रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाओं सहित। जय-जय।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।
मोबाइल 9828108858/9460557355










