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काश ! हमारे यहां भी हो फीनलैंड जैसी शिक्षा प्रणाली व इंफ्रास्ट्रक्चर !

News-Desk by News-Desk
July 27, 2025
in ट्रेंडिंग न्यूज़, राष्ट्रीय, विशेष
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खबरें हटके

​बिलासपुर की आदया श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया, जीता ‘जूनियर मिस इंडिया मिस कॉन्फिडेंट’ का खिताब

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उपभोक्ताओं की उम्मीदों को नया रूप देने वाली जेन ज़ी

 काश ! हमारे यहां भी हो फीनलैंड जैसी शिक्षा प्रणाली व इंफ्रास्ट्रक्चर !

सुनील कुमार महला,

हाल ही में राजस्थान के झालावाड़ के पिपलोदी गांव में एक सरकारी स्कूल(विद्यालय) की इमारत का एक हिस्सा गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत हो गई, यह बहुत ही दुखद और हृदयविदारक घटना है। वास्तव में झालावाड़ में हुई यह घटना हमारे देश के सरकारी स्कूलों की बदहाली के साथ ही साथ हमारे एजुकेशनल सिस्टम पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है।सच तो यह है कि इस हादसे के बाद स्कूल और प्रशासन की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। हादसे के बाद जब बच्चों की मौत हो गई तब शिक्षा मंत्री मदन दिलावर कह रहे हैं कि 2000 स्कूलों को ठीक किया जा रहा है और हादसे के दोषी वे खुद हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या मात्र स्वयं को दोषी ठहराने से इस हृदयविदारक हादसे की भरपाई संभव हो सकती है ? ऐसा भी नहीं है कि जर्जर व खराब हालात वाले स्कूल भवनों के बारे में किसी को जानकारी या सूचनाएं नहीं होती है, लेकिन दुखद यह है कि जानकारी होने के बावजूद भी समय रहते एक्शन नहीं लिया जाता और हादसे हो जाते हैं। हादसे होने के बाद प्रशासन, अधिकारियों, के हाथ-पांव फूलने लगते हैं, लेकिन यदि समय रहते एक्शन ले लिया जाए तो ऐसे हादसों की नौबत ही नहीं आए।पाठक जानते हैं कि बच्चों के लिए स्कूल (विद्यालय) एक प्रकार से दूसरा घर ही होता है, जैसा कि यह सब विद्यालय (विद्या + आलय= विद्या मतलब ज्ञान,इल्म तथा आलय मतलब घर, मकान, जगह, स्थान) के नाम से ही बखूबी स्पष्ट होता है। बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से ‘ज्ञान के इस आलय में’ आते हैं, ताकि वे अपने भविष्य को उज्ज्वल और सुरक्षित बना सकें, लेकिन दुखद है कि सात बच्चे हमारे सिस्टम की लापरवाही व बदहाली की भेंट चढ़ गए। आज राजस्थान ही नहीं हमारे देश में हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां स्कूल बिल्डिंग्स को लेकर डर का साया है और बहुत से स्कूल आज भी मरम्मत, रख-रखाव के इंतजार में हैं। अनेक स्कूलों की चहारदीवारी, भवन, टायलेट्स जर्जर हैं। कहीं पर स्कूलों के फर्श उखड़े पड़ें हैं तो कहीं छतें तो कहीं पर पानी की टंकियां तक ठीक हालात में नहीं हैं। अकेले राजस्थान की ही यदि हम यहां पर बात करें तो, मीडिया में आईं खबरों से यह पता चलता है कि यहां आठ हजार स्कूल ऐसे हैं, जहां बारिश के दिनों में छतें टपकतीं हैं और दीवारें जर्जर हालात में हैं तथा प्लास्टर उखड़ रहा है। ऐसे में यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सरकारी स्कूलों के क्या हालात होंगे ? हाल फिलहाल, झालावाड़ के सरकारी स्कूल में हुई घटना के बारे में पता चला है कि सुबह करीब 8.30 बजे, जब एक मंजिला इमारत की छत गिरी, तब शिक्षकों और कर्मचारियों के अलावा करीब 60 बच्चे स्कूल परिसर(कैंपस) में मौजूद थे। यहां सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठता है कि जब स्कूल की इमारत जर्जर हालत में थी, तो वहां स्कूल किसके आदेश से चलाया जा रहा था ? सवाल यह भी उठता है कि जब गांव वालों और शिक्षकों ने इस संदर्भ में पहले शिकायत की थी तो अधिकारियों ने समय रहते स्कूल की इमारत(बिल्डिंग ) को सुधारने, इसके रख-रखाव(मेंटीनेंस) के लिए कदम क्यों नहीं उठाए ? ऐसे में इसे एक अपराध ही करार दिया जा सकता है। वास्तव में सच तो यह है कि ऐसी आपराधिक लापरवाही अक्षम्य है। स्कूलों का रख-रखाव वास्तव में अधिकारियों की जिम्मेदारी और कर्तव्य है। यदि कोई कमियां हैं तो उन्हें दूर किया जाना आवश्यक है। रख-रखाव में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के लिए वास्तव में तंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। झालावाड़ के जिस सरकारी स्कूल में यह हादसा हुआ है, कहा जा रहा है कि इस स्कूल की इमारत पहले से ही जर्जर अवस्था में थी और लगातार बारिश होने के कारण इसकी हालत और भी खराब हो गई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग को यह निर्देश भी दिए गए थे कि जर्जर भवनों वाले स्कूलों में छुट्टी कर दी जाए, लेकिन हैरत की बात यह है कि यह है कि झालावाड़ का यह सरकारी स्कूल जर्जर भवनों की सूची में था ही नहीं, और इसीलिए यहां के बच्चों की छुट्टी भी नहीं की गई थी। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह स्थानीय प्रशासन की गंभीर लापरवाही और उसकी जवाबदेही की कमी को ही दर्शाती है। यहां बात सिर्फ झालावाड़ की ही नहीं है, कमोबेश पूरे देश में सरकारी स्कूलों का यही आलम है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की इमारतें जर्जर हैं, शिक्षकों की कमी है और स्वच्छ पेयजल, शौचालय और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं तक का अभाव है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि हमारे देश की नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में स्कूलों के बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है। इसमें सभी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने की बात कही गई है। एनईपी 2020 के अनुसार, स्कूलों में स्वच्छ पेयजल और शौचालय, छात्र-छात्राओं के लिए

सुरक्षित और आरामदायक कक्षाएं,खेल का मैदान, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और अन्य आवश्यक सुविधाएं,डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और कंप्यूटर,विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए, स्कूलों में विशेष सुविधाएं और संसाधन, शिक्षकों और छात्रों का उचित अनुपात जैसी बुनियादी सुविधाएं होनी चाहिए, लेकिन आज नई शिक्षा नीति के अनुसार स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद नहीं है। इस संदर्भ में हमें फीनलैंड से प्रेरणा लेने की जरूरत है। पाठकों को बताता चलूं कि दुनिया में सर्वश्रेष्ठ स्कूली शिक्षा प्रणाली फिनलैंड की मानी जाती है। दरअसल, फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली में बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) आधुनिक, सुसज्जित और छात्रों की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। इसमें आधुनिक क्लासरूम, खेल के मैदान, पुस्तकालय, और तकनीकी उपकरण जैसे कि कंप्यूटर, टैबलेट आदि, आधुनिक लैब, विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए सुविधाएं आदि शामिल हैं। फिनलैंड में शिक्षा प्रणाली में बुनियादी ढांचे के लिए सरकार और स्थानीय प्राधिकरण दोनों मिलकर काम करते हैं, और शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए लगातार निवेश करते हैं। कुल मिलाकर यह बात कही जा सकती है कि फीनलैंड में यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी स्कूलों में छात्रों को सीखने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध हो। कहना ग़लत नहीं होगा कि जब स्कूलों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध होता है तो छात्र सक्रिय, रचनात्मक और आत्मविश्वास से सीखने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। बहरहाल, यहां यह भी उल्लेखनीय है कि फिनलैंड के अलावा, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, और कनाडा जैसे देशों की शिक्षा प्रणालियों को भी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि दुनिया बदलने के लिए शिक्षा ही सबसे ताकतवर हथियार है और अच्छी शिक्षा प्रणाली वाले देश अपने छात्रों को उस जरूरी ज्ञान और कौशल से लैस करते हैं, जिनके जरिए वे ना सिर्फ समाज में योगदान दे पाएं, बल्कि आर्थिक तरक्की भी कर पाएं। बहरहाल, हमारा देश एक विकासशील देश है और हम हमारे देश को वर्ष 2047 तक विकसित बनाने का सपना देख रहे हैं और यह तभी संभव है जब हम हमारे यहां अपनी शिक्षा प्रणाली को और बेहतर बनाने की ओर कदम उठायेंगे। इसके लिए हमें जमीनी स्तर पर उतर कर पूरी ईमानदारी, इच्छाशक्ति व संकल्प के साथ काम करना होगा। आज जरूरत इस बात की है कि हम हमारे देश के स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर अपना ध्यान केंद्रित करें। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि सभी स्कूलों की इमारतों की नियमित व पारदर्शी जांच हो और इसके लिए स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति गठित हो जो स्कूल भवनों के स्ट्रक्चर और सिक्योरटी का समय-समय पर आकलन करती रहे। वैसे भी हाल फिलहाल पूरे देश में मानसून का समय चल रहा है, ऐसे समय में हमारे अधिकारियों और प्रशासन को यह चाहिए कि वे देश के तमाम स्कूली और जर्जर सरकारी इमारतों का हाल जानें कि वे किस हालात में हैं और यदि वे ठीक हालात में नहीं हैं तो उनके रख-रखाव के लिए कार्रवाई को समय रहते जवाबदेही के साथ अंजाम दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, इसके लिए स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए और अगर कोई स्कूल असुरक्षित स्थिति में पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। एसएमसी या स्कूल मैनेजमेंट कमेटी एक ऐसी समिति है जो स्कूल के प्रबंधन और विकास में मदद करती है, जिसमें माता-पिता, शिक्षक, और समुदाय के सदस्य शामिल होते हैं। वास्तव में,इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना और छात्रों की शिक्षा में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना है।यह समिति विद्यालय के विभिन्न भौतिक संसाधनों जैसे कि विद्यालय के भवन, मैदान, खेल के मैदान, और पानी की व्यवस्था जैसी भौतिक सुविधाओं के रख-रखाव ,सुधार और प्रबंधन में मदद करती है।एसएमसी विद्यालय को मिलने वाले अनुदानों का सही उपयोग सुनिश्चित करती है और विद्यालय के वित्तीय मामलों का प्रबंधन करती है और विद्यालय के विकास के लिए योजनाएं बनाती है और उन्हें लागू करने में मदद करती है। इतना ही नहीं,यह समिति छात्रों और अभिभावकों की शिकायतों का समाधान करने, तथा माता-पिता और समुदाय के सदस्यों के साथ नियमित बैठकों का आयोजन करने में भी मदद करती है। बहरहाल, झालावाड़ के सरकारी स्कूल में जो हादसा हुआ, उसे महज एक और दुर्घटना मानकर खारिज नहीं किया जा सकता है बल्कि यह पूरी व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। वास्तव में सरकार के साथ साथ ही हमारे प्रशासन और समाज विशेषकर ‘एसएमसी'(स्कूल मैनेजमेंट कमेटी) को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित व अच्छा हो। सच तो यह है कि यह हम सभी की एक नैतिक जिम्मेदारी व परम् दायित्व तो है ही, एक मजबूत व उज्जवल भारत की पूर्व शर्त भी है।यह बहुत अफसोस और निंदा की बात है कि अधिकारी बहाना बनाकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते नज़र आते हैं। वास्तव में झालावाड़ हादसे के मामले में शिक्षकों, प्रधानाध्यापक की भी कहीं न कहीं कमी रही है। हाल फिलहाल, राज्य सरकार को पूरी कड़ाई के साथ हादसे के कारणों की जांच पड़ताल करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि इस हादसे के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? ध्यान रहे, स्कूल की इमारत से जुड़ा यह कोई पहला हादसा नहीं है। पाठकों को बताता चलूं कि हाल ही में जुलाई माह 2025 में ही केरल के कोल्लम जिले में एक बॉयज स्कूल में 13 साल के आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र की करंट लगने से मौत हो गई। दरअसल, स्कूल के ऊपर से जा रहे तारों के नीचे टिन की चादरों से बना एक साइकिल शेड खतरे की घंटी था। जानकारी के अनुसार हादसा तब हुआ जब बच्चा स्कूल में दोस्तों के साथ खेल रहा था। खेल के दौरान उसका जूता एक टिन शेड पर चला गया। वह उसे लेने के लिए जैसे ही ऊपर चढ़ा, वहां लगे बिजली के तार की चपेट में आ गया। इतना ही नहीं, पिछले साल दिसंबर माह में केरल के एर्नाकुलम जिले में उदयमपेरूर के पास कंदनाड में जूनियर बेसिक स्कूल परिसर में आंगनवाड़ी भवन की टाइल वाली छत गुरुवार (19 दिसंबर, 2024) सुबह के समय गिर गई थी। हालांकि, यह बात अलग है कि इस घटना में कोई भी हताहत नहीं हुआ।इसी प्रकार से पिछले साल बारिश के दिनों में ही उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में एक स्कूल की पहली मंजिल की बालकनी का एक हिस्सा गिरने से कम से कम 40 बच्चे घायल हो गए थे। बहरहाल, आंकड़ों से यह पता चलता है कि भारत में सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी आज भी एक गंभीर व बड़ी समस्या है। आज देश में कुछ सरकारी स्कूल तो ऐसे भी हैं जिनके पास खुद की जमीन तक नहीं है। प्रायः यह भी देखा गया है कि अपना भवन नहीं होने के कारण एक ही स्कूल परिसर में एक से अधिक स्कूलों का संचालन हो रहा है। बच्चे आज भी टीन शैड, कच्चे भवनों और पेड़ों के नीचे पढ़ते हैं। गौरतलब है कि साल 2021 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया था कि देश में 27,099 सरकारी स्कूलों के पास उचित भवन नहीं हैं। काश कि हमारे देश में भी हम फीनलैंड की शिक्षा प्रणाली को अपनाते हुए हमारे स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत और बना पाएं। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा से ज्ञान, कौशल, और समझ का विकास होता है, जो जीवन के हर पहलू में सफलता की कुंजी है। शिक्षा ही हमें बेहतर इंसान बनाती है, सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास कराती है, और एक बेहतर समाज और देश के निर्माण में मदद करती है। शिक्षा में किसी भी प्रकार की खामी हमारे लिए हर प्रकार से नुकसानदायक है।

 

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।

मोबाइल 9828108858

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Tags: फीनलैंड जैसी शिक्षा प्रणाली व इंफ्रास्ट्रक्चर !
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