तपती कक्षाएँ और संवेदनहीन व्यवस्था
क्या बच्चों और शिक्षकों को गर्मी नहीं लगती?
– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत इस समय भीषण गर्मी के दौर से गुजर रहा है। हर वर्ष तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है। मौसम विभाग लगातार हीट वेव की चेतावनियाँ जारी करता है। लोग घरों से बाहर निकलने से बच रहे हैं। सरकारी कार्यालयों, निजी कंपनियों, बैंक, मॉल और बड़े संस्थानों में कूलर और एयर कंडीशनर की व्यवस्था सामान्य बात हो चुकी है। कर्मचारियों की सुविधा और कार्यक्षमता के लिए वातानुकूलित वातावरण को आवश्यक माना जाता है। लेकिन जब बात स्कूलों की आती है तो तस्वीर अचानक बदल जाती है। देश के लाखों बच्चे और शिक्षक आज भी तपती हुई कक्षाओं में बैठकर दिन बिताने को मजबूर हैं। ऐसा लगता है मानो व्यवस्था ने यह मान लिया हो कि केवल स्कूल के बच्चों और मास्टरों को ही गर्मी नहीं लगती।
यह केवल एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि हमारे शिक्षा तंत्र की दुखद सच्चाई है। जिस देश में बच्चों को “राष्ट्र का भविष्य” कहा जाता है, वहीं उन्हीं बच्चों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। शिक्षा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, स्मार्ट क्लास, डिजिटल इंडिया और नई शिक्षा नीति की बातें होती हैं, लेकिन जब कोई सरकारी स्कूल की वास्तविक स्थिति देखता है तो सारे दावे खोखले दिखाई देते हैं। गर्मी के दिनों में कई सरकारी स्कूलों की स्थिति किसी भट्ठी से कम नहीं होती। कहीं टीन की छतें धूप में तपकर आग उगलती हैं, कहीं छोटे-छोटे कमरों में दर्जनों बच्चे ठूँस दिए जाते हैं। कई स्कूलों में पंखे खराब पड़े रहते हैं, तो कहीं बिजली की ही व्यवस्था नहीं होती। खिड़कियाँ या तो टूटी होती हैं या इतनी छोटी कि हवा का प्रवेश ही न हो सके। ऐसे वातावरण में बच्चे घंटों बैठकर पढ़ाई करने की कोशिश करते हैं।
कल्पना कीजिए, जब बाहर तापमान 45 डिग्री के पार हो और भीतर बैठा बच्चा पसीने से तरबतर हो, तब उसका ध्यान किताबों में कैसे लगेगा? छोटे बच्चे बार-बार पानी पीने के लिए उठते हैं, कुछ बच्चों को चक्कर आने लगते हैं, कई बच्चे थकान और बेचैनी से परेशान हो जाते हैं। कई बार हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन जैसी घटनाएँ भी सामने आती हैं। इसके बावजूद शिक्षा व्यवस्था में बैठे लोगों को यह समस्या शायद उतनी गंभीर नहीं लगती। शिक्षकों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। उन्हें उसी गर्म वातावरण में लगातार कई पीरियड लेने होते हैं। बोर्ड पर लिखना, बच्चों को संभालना और पढ़ाना, यह सब आसान नहीं होता। लेकिन विडंबना यह है कि जिन शिक्षकों पर भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी है, उनकी कार्य परिस्थितियों पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है।
यदि किसी सरकारी कार्यालय का एसी खराब हो जाए तो शिकायत तुरंत दर्ज होती है और मरम्मत की व्यवस्था भी जल्दी हो जाती है। कर्मचारियों की सुविधा को “कार्य दक्षता” से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन स्कूलों में बच्चों और शिक्षकों के लिए कूलर या एसी की बात होते ही अक्सर यह कह दिया जाता है कि “इतनी सुविधाएँ संभव नहीं हैं” या “यह अनावश्यक खर्च है।” सवाल यह है कि क्या बच्चों का स्वास्थ्य और शिक्षा कम महत्वपूर्ण है? यदि आरामदायक वातावरण किसी कर्मचारी की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है, तो वही वातावरण बच्चों की सीखने की क्षमता और मानसिक एकाग्रता को क्यों नहीं बढ़ाएगा?
आज बड़े शहरों के निजी स्कूलों में एयर कंडीशनर युक्त कक्षाएँ आम होती जा रही हैं। वहाँ पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक सुविधाएँ मिलती हैं। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों के बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते हैं। यह केवल सुविधा का अंतर नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का जीवंत उदाहरण है। एक तरफ अमीर बच्चों के लिए ठंडी और स्मार्ट कक्षाएँ हैं, दूसरी तरफ गरीब परिवारों के बच्चे तपती दीवारों और पसीने भरे कमरों में बैठने को मजबूर हैं। शिक्षा में समानता की बातें करने वाला समाज इस असमानता पर अक्सर चुप दिखाई देता है।
शिक्षा केवल किताबों, परीक्षाओं और पाठ्यक्रम का नाम नहीं है। सीखने के लिए एक स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण भी उतना ही आवश्यक होता है। मनोवैज्ञानिक और शिक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से यह बताते आए हैं कि अत्यधिक गर्मी बच्चों की एकाग्रता, स्मरण शक्ति और मानसिक सक्रियता को प्रभावित करती है। गर्म वातावरण में बच्चा जल्दी थक जाता है और उसकी सीखने की क्षमता कम हो जाती है। जब बच्चा पूरे समय गर्मी से परेशान रहेगा, तो वह पाठ पर ध्यान कैसे केंद्रित करेगा? शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को स्कूल भेजना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा वातावरण देना है जहाँ वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर सीख सकें।
विडंबना यह है कि सरकारें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए करोड़ों रुपये डिजिटल योजनाओं पर खर्च करती हैं, लेकिन कक्षाओं के तापमान पर शायद ही कभी चर्चा होती है। जबकि सच्चाई यह है कि गर्मी से जूझता बच्चा स्मार्ट बोर्ड से अधिक एक ठंडी हवा की जरूरत महसूस करता है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों की स्थिति तो और भी अधिक चिंताजनक है। कई गाँवों में बिजली की आपूर्ति ही नियमित नहीं होती। कुछ स्कूलों में आज भी पर्याप्त कमरे नहीं हैं। बच्चे पेड़ों के नीचे या खुले बरामदों में बैठकर पढ़ते हैं। ऐसे स्थानों पर कूलर या एसी की कल्पना करना भी कठिन लगता है। कई स्कूलों में पीने के पानी की समस्या भी गंभीर होती है। गर्मियों में पानी के टैंक सूख जाते हैं या पानी इतना गर्म हो जाता है कि पीना मुश्किल हो जाता है। बच्चों को कई बार दूर से पानी लाना पड़ता है। यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
हर वर्ष शिक्षक दिवस, बाल दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर नेताओं के भाषणों में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया जाता है। “बच्चे देश का भविष्य हैं” जैसी पंक्तियाँ बार-बार दोहराई जाती हैं। लेकिन वास्तविक प्राथमिकताएँ स्कूलों की स्थिति देखकर समझी जा सकती हैं। यदि वास्तव में बच्चे देश का भविष्य हैं, तो क्या उन्हें कम से कम इतना अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वे सम्मानजनक वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर सकें? क्या यह उचित है कि कार्यालयों की सुविधाएँ प्राथमिकता बन जाएँ और बच्चों की मूलभूत आवश्यकताएँ उपेक्षित रह जाएँ?
यह समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि सोच की भी है। हमारे समाज में अक्सर बच्चों और शिक्षकों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता। यह मान लिया गया है कि स्कूलों में थोड़ी असुविधा “सामान्य” है। यही सोच सबसे बड़ी समस्या है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में गर्मी लगातार बढ़ रही है। कई शहरों में तापमान 47-48 डिग्री तक पहुँच चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में हीट वेव की घटनाएँ और अधिक बढ़ेंगी। ऐसे में स्कूलों की पारंपरिक व्यवस्था अब पर्याप्त नहीं रह गई है। आज आवश्यकता है कि स्कूल भवनों का निर्माण मौसम के अनुसार किया जाए। पर्याप्त वेंटिलेशन, हरे पेड़, ठंडे छत डिज़ाइन, स्वच्छ पेयजल और तापमान नियंत्रण जैसी सुविधाएँ अनिवार्य हों। यह विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
सरकार यदि चाह ले तो चरणबद्ध तरीके से सरकारी स्कूलों में कूलर और बेहतर पंखों की व्यवस्था की जा सकती है। सौर ऊर्जा आधारित समाधान भी अपनाए जा सकते हैं। कई राज्यों में मिड-डे मील, स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा जैसी योजनाएँ सफलतापूर्वक लागू हुई हैं, तो बच्चों को गर्मी से राहत देने की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए संवेदनशील सोच और वास्तविक प्राथमिकता की जरूरत है। केवल घोषणाओं और विज्ञापनों से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी।
समाज को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। हम अक्सर अपने बच्चों के लिए निजी स्कूलों की सुविधाएँ देखते हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की दुर्दशा को सामान्य मान लेते हैं। सामाजिक संगठनों, पंचायतों, स्थानीय प्रशासन और अभिभावकों को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
हमारे समाज में शिक्षक को “गुरु” कहकर सम्मान दिया जाता है। शिक्षक दिवस पर बड़े-बड़े कार्यक्रम होते हैं। लेकिन वास्तविक सम्मान केवल भाषणों और फूलों से नहीं मिलता। सम्मान तब मिलता है जब शिक्षक को बेहतर कार्य परिस्थितियाँ दी जाएँ। जो शिक्षक स्वयं गर्मी, थकान और असुविधा से जूझ रहा हो, उससे सर्वोत्तम प्रदर्शन की अपेक्षा करना उचित नहीं है। यदि हम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना चाहते हैं, तो शिक्षकों के कार्य वातावरण को बेहतर बनाना ही होगा।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी कक्षाओं में तैयार होता है। यदि वे कक्षाएँ ही तपती भट्टियों में बदल जाएँ, तो विकास के सारे दावे खोखले लगने लगते हैं। बच्चे केवल आँकड़े नहीं होते, वे सपने होते हैं। और सपनों को पनपने के लिए अनुकूल वातावरण चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि हम शिक्षा को केवल नीतियों और भाषणों का विषय न बनाएँ, बल्कि उसकी वास्तविक परिस्थितियों पर ध्यान दें। बच्चों और शिक्षकों को भी वही सम्मान और सुविधाएँ मिलनी चाहिए जो समाज के अन्य वर्गों को मिलती हैं। क्योंकि सच यही है— जिस देश के बच्चे तपती कक्षाओं में बैठने को मजबूर हों, वहाँ विकास की चमक अधूरी ही मानी जाएगी।