
क्या फैमिली डॉक्टर विलुप्त होने की कगार पर हैं? डॉ विजय गर्ग
कभी भारत के लगभग हर कस्बे और गाँव में एक ऐसा डॉक्टर होता था, जिसे पूरा परिवार जानता था और जो पूरे परिवार के स्वास्थ्य का भरोसेमंद साथी माना जाता था। उसे “फैमिली डॉक्टर” या “पारिवारिक चिकित्सक” कहा जाता था। वह केवल दवाइयाँ लिखने वाला चिकित्सक नहीं, बल्कि परिवार की चिकित्सा पृष्ठभूमि, जीवनशैली, आर्थिक स्थिति और सामाजिक परिस्थितियों को समझने वाला मार्गदर्शक भी होता था। आज बदलती चिकित्सा व्यवस्था, बढ़ती विशेषज्ञता और कॉर्पोरेट अस्पतालों के विस्तार के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या फैमिली डॉक्टर विलुप्त होने की कगार पर हैं?
फैमिली डॉक्टर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह रोगी को केवल बीमारी के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यक्ति और परिवार के सदस्य के रूप में देखता था। उसे यह पता होता था कि मरीज को पहले कौन-सी बीमारी रही है, परिवार में कौन-सी आनुवंशिक समस्याएँ हैं, किस दवा से एलर्जी है और किन परिस्थितियों में कौन-सा उपचार बेहतर रहेगा। इस कारण उपचार अधिक प्रभावी और भरोसेमंद होता था।
समय के साथ चिकित्सा विज्ञान में अनेक नई विशेषज्ञताएँ विकसित हुईं। आज हृदय रोग, किडनी, कैंसर, न्यूरोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, त्वचा रोग, हड्डी रोग और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। यह प्रगति निश्चित रूप से चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि है। लेकिन इसका एक दुष्प्रभाव यह भी हुआ कि सामान्य चिकित्सकों की भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती चली गई। अब हल्की-सी समस्या होने पर भी लोग सीधे विशेषज्ञ डॉक्टर के पास पहुँच जाते हैं।
कॉर्पोरेट अस्पतालों और बड़े चिकित्सा संस्थानों के बढ़ते प्रभाव ने भी इस बदलाव को तेज़ किया है। आधुनिक सुविधाएँ, उन्नत मशीनें और बड़े अस्पताल लोगों को आकर्षित करते हैं। वहीं छोटे क्लीनिक चलाने वाले फैमिली डॉक्टर आर्थिक और व्यावसायिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। नई पीढ़ी के कई डॉक्टर भी निजी क्लीनिक खोलने की बजाय बड़े अस्पतालों या किसी एक विशेषज्ञता में करियर बनाना अधिक सुरक्षित और लाभदायक मानते हैं।
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भी लोगों के स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार को बदल दिया है। कई लोग पहले इंटरनेट पर लक्षण खोजते हैं, फिर स्वयं दवा लेने लगते हैं या सीधे किसी विशेषज्ञ के पास पहुँच जाते हैं। इससे फैमिली डॉक्टर की सलाह लेने की परंपरा कमजोर होती जा रही है। हालांकि इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन वह किसी अनुभवी चिकित्सक की समझ और निर्णय का स्थान नहीं ले सकता।
फैमिली डॉक्टर का महत्व केवल इलाज तक सीमित नहीं था। वह रोगों की रोकथाम, टीकाकरण, नियमित स्वास्थ्य जांच, जीवनशैली में सुधार और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति भी लोगों को जागरूक करता था। कई बार वह समय रहते गंभीर बीमारी के शुरुआती संकेत पहचान लेता था और उचित विशेषज्ञ के पास भेज देता था। इस प्रकार वह स्वास्थ्य व्यवस्था का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता था।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की आवश्यकता अपनी जगह है, लेकिन हर मरीज को शुरुआत में विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं होती। सर्दी-जुकाम, बुखार, संक्रमण, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, बच्चों और बुजुर्गों की सामान्य समस्याएँ तथा कई अन्य बीमारियों का सफल उपचार एक प्रशिक्षित फैमिली डॉक्टर कर सकता है। इससे विशेषज्ञों पर अनावश्यक बोझ भी कम होता है और मरीज का समय तथा धन दोनों बचते हैं।
ग्रामीण भारत में फैमिली डॉक्टर की भूमिका आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे स्थानों पर सामान्य चिकित्सक ही लोगों की पहली उम्मीद होते हैं। यदि इनकी संख्या घटती रही, तो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
सरकार और चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को भी इस दिशा में गंभीरता से विचार करना होगा। मेडिकल शिक्षा में फैमिली मेडिसिन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। युवा डॉक्टरों को इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहन, प्रशिक्षण और बेहतर अवसर मिलने चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत बनाना और फैमिली डॉक्टरों को आधुनिक तकनीक तथा डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ना भी आवश्यक है।
समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह हर छोटी समस्या के लिए सीधे विशेषज्ञ के पास जाने की बजाय पहले योग्य सामान्य चिकित्सक से परामर्श ले। इससे स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर उपयोग होगा और मरीज को समग्र तथा व्यक्तिगत देखभाल भी मिलेगी।
भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता , टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड का उपयोग तेजी से बढ़ेगा, लेकिन इन तकनीकों के बावजूद मरीज और डॉक्टर के बीच विश्वास, संवाद और मानवीय संवेदनाएँ सबसे महत्वपूर्ण रहेंगी। यही गुण फैमिली डॉक्टर की सबसे बड़ी पहचान रहे हैं।
अंततः, फैमिली डॉक्टर पूरी तरह विलुप्त नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी संख्या और भूमिका निश्चित रूप से कम होती जा रही है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो समाज एक ऐसी चिकित्सा परंपरा खो सकता है जिसने दशकों तक करोड़ों परिवारों को सुलभ, सस्ती और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान कीं। इसलिए फैमिली डॉक्टरों को बचाना केवल एक पेशे को बचाना नहीं, बल्कि मानव-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था की उस अमूल्य विरासत को संरक्षित करना है, जिसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही है जितनी पहले थी।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
Post Views: 30