नई दिल्ली-शादी समारोह में दूल्हा -दुल्हन इस वजह से खाते हैं एक ही थाली में
सनातन विवाह परंपरा में इसके पीछे एक बेहद गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक फलसफा छिपा हुआ है
झिझक मिटाने का मनोवैज्ञानिक जरिया, गहरा होता है भावनात्मक जुड़ाव
नई दिल्ली (BNE): भारतीय शादियों में निभाई जाने वाली हर छोटी-बड़ी रस्म केवल रीति-रिवाजों का हिस्सा नहीं होती, बल्कि उनके पीछे सदियों पुराने वैज्ञानिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण जुड़े होते हैं। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय और खूबसूरत परंपरा है फेरों के तुरंत बाद दूल्हा-दुल्हन का एक ही थाली में बैठकर भोजन करना। पहली नजर में यह रस्म भले ही परिजनों के बीच हंसी-मजाक या एक मनोरंजक खेल जैसी नजर आती हो, लेकिन सनातन विवाह परंपरा में इसके पीछे एक बेहद गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक फलसफा छिपा हुआ है।
झिझक मिटाने का मनोवैज्ञानिक जरिया, गहरा होता है भावनात्मक जुड़ाव
विशेषज्ञों और ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार, इस रस्म का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक पहलू नवविवाहित जोड़े के बीच की दूरी को पाटना है। शादी के शुरुआती पलों में दोनों के मन में जो संकोच, अनजानापन और हिचकिचाहट होती है, वह एक ही थाली से एक-दूसरे को निवाला खिलाने से सहजता में बदल जाती है। जब दोनों एक-दूसरे के साथ भोजन साझा करते हैं, तो आपसी संवाद स्वाभाविक हो जाता है और दांपत्य जीवन की पहली सीढ़ी पर ही प्रेम, विश्वास और अपनापन गहराने लगता है।
सुख-दुख में बराबरी का संदेश, जिंदगी के सफर में तय होती है समान साझेदारी
थाली बांटने की यह प्रथा प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश देती है कि विवाह के बाद पति-पत्नी का केवल घर ही नहीं, बल्कि सुख-दुख, खान-पान और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी पूरी तरह साझा हो चुकी हैं। यह परंपरा नव-दंपति को यह अहसास कराती है कि जीवन के नए सफर में कोई छोटा या बड़ा नहीं, बल्कि दोनों हर परिस्थिति में बराबर के भागीदार हैं। भोजन साझा करना जीवन के हर मोड़ पर एक-दूसरे का सहारा बनने की मूक प्रतिज्ञा का प्रतीक माना जाता है।
सकारात्मक ऊर्जा का आदान-प्रदान और मजबूत रिश्ते की नींव
ज्योतिष शास्त्र में अन्न और भोजन को ऊर्जा का मुख्य वाहक माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, जब दो आत्माएं विवाह के पवित्र बंधन में बंधने के बाद साथ भोजन करती हैं, तो उनके भीतर की सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) का परस्पर आदान-प्रदान होता है। इससे वैवाहिक जीवन में मानसिक संतुलन, मधुरता और सामंजस्य बना रहता है। हल्के-फुल्के माहौल में निभाई जाने वाली यह पारंपरिक रस्म असल में दो अनजान दिलों को एक सूत्र में पिरोने और दांपत्य की नींव को अटूट बनाने का सबसे खूबसूरत माध्यम है।










