नई दिल्ली-हिरासत के 24 घंटे के अंदर पेश न करने पर व्यक्ति को करना होगा रिहा-SUPREEM COURT
नशीली गोलियों की बरामदगी से जुड़ा है मामला,त्रिपुरा हाईकोर्ट से नहीं मिली थी राहत
नई दिल्ली(BNE)- सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के साथ ही उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा शुरू हो जाती है। इसकी गणना औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से की जाएगी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले अपनी हिरासत में लेकर कई घंटे बाद उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने की प्रक्रिया नहीं अपना सकतीं। ऐसा करने से गिरफ्तारी के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
यह फैसला त्रिपुरा के चार आरोपियों की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। आरोपियों ने दावा किया था कि पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेने के करीब 21 घंटे बाद औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया था। मामले की सुनवाई जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की।
नशीली गोलियों की बरामदगी से जुड़ा है मामला
मामला त्रिपुरा में 11.03 किलोग्राम याबा टैबलेट की बरामदगी से संबंधित है। जानकारी के अनुसार, 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान चारों आरोपियों को हिरासत में लिया गया था। हालांकि, पुलिस रिकॉर्ड में उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दर्ज की गई।
इस तरह पुलिस की ओर से हिरासत में लिए जाने और गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के बीच लगभग 21 घंटे का अंतर था। आरोपियों का कहना था कि पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेने के बाद निर्धारित 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया।
त्रिपुरा हाईकोर्ट से नहीं मिली थी राहत
चारों आरोपियों ने इस आधार पर कानूनी राहत की मांग की थी। हालांकि, त्रिपुरा हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा की गणना को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठा। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस हिरासत के दौरान किसी को बिना न्यायिक निगरानी के अनावश्यक रूप से न रखा जाए।
अदालत की इस टिप्पणी से जांच एजेंसियों के लिए यह स्पष्ट संदेश गया है कि हिरासत और गिरफ्तारी के समय को अलग-अलग दिखाकर संवैधानिक समयसीमा से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती।









