जो साथ है, वही असली
-डॉ. प्रियंका सौरभ
बुरा वक़्त अकेला नहीं आता,
वह अपने साथ बहुत कुछ समेट ले जाता है।
छीनता है रिश्तों का शोर,
सहारे का भ्रम,
और जाते-जाते
एक सवाल छोड़ जाता है—
कि इस भीड़ में
वास्तव में मेरा है कौन?
ऐसे समय
दिन तो मुस्कान की औपचारिकता में कट जाते हैं,
पर रात…
रात घने अँधेरे में
आसमाँ की ओर ताकते हुए
मन से सवाल करती है—
क्या मैं सच में हार गया हूँ?
पर नहीं,
यह हार नहीं होती।
यह ठहराव होता है,
आत्मा की परीक्षा,
जहाँ इंसान
दूसरों को नहीं,
खुद को पहचानता है।
जो सवाल पूछ रहा है,
वह हारा हुआ नहीं है।
हारा हुआ तो वह होता है
जो सवाल करना ही छोड़ दे।










