
सोशल मीडिया और घटती खुशियां: क्या कहती है वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2026?
–सुनील कुमार महला
फिनलैंड एकबार फिर से विश्व का सबसे खुशहाल देश बन गया है। पाठकों को बताता चलूं कि फिनलैंड लगातार 9वीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना है। 19 मार्च 2026 नवसंवत्सर के दिन (गुरुवार को) जारी वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2026 में भारत 116वें स्थान पर रहा है। गौरतलब है कि वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2026 का निर्माण ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर द्वारा किया गया है।यह भी गौरतलब है कि यह रिपोर्ट एक सहयोगात्मक प्रयास है, जिसमें गैलप तथा यूनाइटेड नेशंस सस्टेनेबल डेवलपमेंट सोल्यूशन्स नेटवर्क जैसी संस्थाएँ भी सहभागी होती हैं और इन सभी के संयुक्त प्रयासों से वैश्विक स्तर पर लोगों की खुशी, जीवन संतोष और सामाजिक-आर्थिक कारकों का विश्लेषण कर यह रिपोर्ट तैयार की जाती है।
अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग और रील स्क्रॉलिंग के कारण आ रही है खुशी/प्रसन्नता के स्तर में गिरावट:-
जारी इस रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग और रील स्क्रॉलिंग से आज युवाओं(यंग जनरेशन) के मानसिक स्वास्थ्य(मेंटल हेल्थ) और खुशी(हैप्पीनेस) के स्तर में गिरावट आ रही है।रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि आज के समय में युवाओं में मानसिक तनाव और अकेलेपन की समस्या बढ़ रही है। बहरहाल, यदि हम यहां पर खुशी के प्रमुख कारकों की बात करें तो, इनमें क्रमशः सामाजिक समर्थन, विश्वास, स्वतंत्रता, उदारता और जीवन संतुष्टि को मुख्य आधार माना गया है तथा परिवार, मित्र और समाज से जुड़ाव(सामाजिक जुड़ाव) को खुशी का सबसे बड़ा स्रोत बताया गया है। वास्तव में, आज जरूरत इस बात की है कि हम संतुलित जीवनशैली अपनाएं।इस क्रम में हाल ही जारी रिपोर्ट ने डिजिटल जीवन और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया है। सरल शब्दों में कहें तो रिपोर्ट में डिजिटल डिटॉक्स की सलाह दी गई है। वास्तव में, रिपोर्ट में युवाओं को समय-समय पर सोशल मीडिया से दूरी बनाने की सलाह दी गई है या यूं कहें कि कम आभासी दुनिया, ज्यादा वास्तविक जुड़ाव यही स्थायी खुशी का रास्ता है।
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में नॉर्डिक देशों का दबदबा:-
बहरहाल, यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में नॉर्डिक देशों( फिनलैंड,डेनमार्क, आइसलैंड और स्वीडन) का दबदबा रहा है और वे शीर्ष पर बने हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार आइसलैंड (2), डेनमार्क (3), स्वीडन (5) और नॉर्वे (6) जैसे देश टॉप 10 में बने हुए हैं। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि इस साल का सबसे बड़ा सरप्राइज कोस्टा रिका रहा, जो 4थे स्थान पर पहुंच गया है। यह किसी भी लैटिन अमेरिकी देश की अब तक की सबसे ऊंची रैंकिंग है। वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान (147) सबसे निचले पायदान पर है, उसके बाद सिएरा लियोन और मलावी का स्थान है। यह भी उल्लेखनीय है कि लगातार दूसरे साल कोई भी प्रमुख अंग्रेजी भाषी देश (जैसे अमेरिका 23वें, ब्रिटेन 29वें) टॉप 10 में जगह नहीं बना पाया है। हाल ही में जो वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट जारी की गई है, वह मुख्य रूप से 6 कारकों क्रमशः प्रति व्यक्ति जीडीपी, सामाजिक सहयोग, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, जीवन के फैसले लेने की स्वतंत्रता,उदारता तथा भ्रष्टाचार का बोध पर आधारित है। वास्तव में, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा और कम असमानता वाले देश ज्यादा खुश पाए गए हैं। रिपोर्ट में सामने आया है कि आर्थिक समृद्धि ही सब कुछ नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो केवल आय नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और संतुलन खुशी तय करते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज की भागमभाग भरी, आपाधापी वाली जीवनशैली (शहरी जीवनशैली) लोगों के बीच लगातार दूरियां बढ़ा रही है और लोग लोनलीनेस (अकेलापन) महसूस करते हैं, जो नाखुशी का कारण है। जानकारी के अनुसार खासकर 15–30 आयु वर्ग में खुशी का स्तर घटा है, जिसका कारण डिजिटल निर्भरता और सामाजिक तुलना बताया गया है।
बुजुर्गों का जीवन संतोष युवाओं की तुलना में अधिक:-
कई देशों में बुजुर्गों का जीवन संतोष युवाओं की तुलना में अधिक पाया गया है, जैसा कि बुजुर्ग लोग कम डिजिटल निर्भर हैं और सामाजिक भी हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया के अधिकांश हिस्सों में युवा बुजुर्गों की तुलना में अधिक खुश हैं, लेकिन अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह स्थिति उलट गई है-वहां के युवा अब अपने बुजुर्गों की तुलना में कम खुश हैं। रिपोर्ट में एशियाई देशों का मिश्रित प्रदर्शन रहा है। गौरतलब है कि भारत सहित कई एशियाई देशों की रैंकिंग मध्यम या निम्न रही है, हालांकि सामाजिक संरचना मजबूत मानी गई है। उल्लेखनीय है कि भारत की रैंकिंग में मामूली सुधार हुआ है, जैसा कि भारत 116वें स्थान पर है। वर्ष 2025 में भारत 118वें स्थान पर था। वहीं पर यदि हम पड़ोसी देशों की बात करें तो पाकिस्तान (104) और युद्ध से जूझ रहे इज़राइल (8) व ईरान (97) जैसे देश भी रैंकिंग में भारत से ऊपर हैं।युद्ध के बावजूद इज़रायल टॉप 10 (8वें स्थान) में बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति जीडीपी, सामाजिक समर्थन और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा (औसतन 58.2 वर्ष) जैसे मानकों पर प्रदर्शन कमजोर रहा है।दूसरों की मदद करना, दान और समाज में भरोसा-ये सभी खुशी को बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण तत्व पाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर कई जगहों पर ग्रामीण जीवन में संतोष का स्तर शहरों से अधिक पाया गया है।
अप्रसन्नता/नाखुशी के प्रमुख कारण/कारक क्या हैं ?
बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में विश्व के अनेक देश पूर्ण रूप से खुश नहीं हैं, इसके पीछे कई गहरे और आपस में जुड़े कारण हैं। दरअसल, केवल आर्थिक प्रगति ही खुशी की गारंटी नहीं देती, बल्कि सामाजिक, मानसिक और पर्यावरणीय कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। सबसे पहला कारण है-आर्थिक असमानता। कई देशों में अमीर और गरीब के बीच खाई लगातार बढ़ रही है, जिससे समाज में असंतोष और असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। इसके साथ ही बेरोजगारी और महंगाई भी लोगों के जीवन को कठिन बना रही है, जिससे रोजमर्रा का जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। दूसरा बड़ा कारण है मानसिक स्वास्थ्य की गिरावट। आज के डिजिटल युग में अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग, तुलना की प्रवृत्ति और अकेलापन लोगों की खुशी को प्रभावित कर रहे हैं। खासकर युवाओं में चिंता, अवसाद और असंतोष बढ़ रहा है। तीसरा कारण है युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता। दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष, आतंकवाद और सत्ता संघर्ष जारी हैं, जिससे लोगों का जीवन असुरक्षित और भयग्रस्त हो जाता है। शांति के अभाव में स्थायी खुशी संभव नहीं होती। इसके अलावा, पर्यावरण संकट भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक आपदाएं लोगों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं। इसके अलावा, सामाजिक संबंधों में कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। परिवार और समाज से दूरी, व्यक्तिगत जीवन में बढ़ती व्यस्तता और आत्मकेंद्रित जीवनशैली ने लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को कमजोर किया है। अतः यह कहा जा सकता है कि आज दुनिया में खुशी की कमी केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई जटिल परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। जब तक देश आर्थिक विकास के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संतुलन और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक वास्तविक और स्थायी खुशी प्राप्त करना कठिन रहेगा।
अंत में, यही कहूंगा कि वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2026 यह स्पष्ट करती है कि केवल आर्थिक समृद्धि ही किसी राष्ट्र की खुशहाली का पैमाना नहीं हो सकती। जहाँ फिनलैंड ने लगातार नौवीं बार शीर्ष पर रहकर अपनी सामाजिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मॉडल को दुनिया के सामने मिसाल के रूप में पेश किया है, वहीं कोस्टा रिका जैसे देशों का उत्थान यह बताता है कि प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक सहयोग जीवन संतुष्टि के लिए अनिवार्य हैं। भारत के संदर्भ में, 116वें स्थान पर रहने के बावजूद मामूली सुधार एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन स्वस्थ जीवन प्रत्याशा और सामाजिक समर्थन जैसे बुनियादी ढांचों में अभी भी बड़े बदलाव की आवश्यकता महसूस की गई है। रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू युवाओं की मानसिक स्थिति है, जहाँ सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और डिजिटल अलगाव(डिजिटल आइसोलेशन) के कारण उनके सुख के स्तर में गिरावट देखी गई है। अंततः, यह रिपोर्ट नीति-निर्माताओं को सचेत करती है कि भविष्य की योजनाएँ केवल जीडीपी(सकल घरेलू उत्पाद) पर केंद्रित न होकर नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य, उदारता और आपसी विश्वास को बढ़ाने वाली होनी चाहिए।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।
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