मन का रावण
लो फिर पुतला फूँककर,
गजब किया संहार।
मन के रावण दुष्ट से,
गया आदमी हार।।
धधक उठी लपटें बड़ी,
गूँजे जय-जयकार।
भीतर जो था अंधकार,
रहा वही साकार।।
बाहरी रावण राख हो,
मन का जीवित शेष।
अभिमान, क्रोध, लोभ में,
हर पल रहे विशेष।।
धर्म की बातें हों मगर,
कर्म बने विश्वास।
राम की मर्यादा कहाँ,
ढूँढे जग में पास।।
सच का दीपक जल उठे,
मन से मिटे अंधकार।
तभी मिलेगा जीत का,
सच्चा हमें उपहार।।
— – डॉo सत्यवान सौरभ










