
Microplastics-वर्ष 2040 तक माइक्रो प्लास्टिक का प्रदूषण करीब दोगुना हो जाएगा
माइक्रोप्लास्टिक’ आज जल-जीवन ही नहीं, हमारे भोजनचक्र में भी शामिल हो गया है
विजय गर्ग
समुद्र के बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र की समस्या को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक आगाह करते रहे हैं। मगर मनुष्य के निजी स्वार्थ, लापरवाही और अनदेखी करने की प्रवृत्ति के कारण समुद्री जीवन का दम घुट रहा। दुनिया के तीन अरब से अधिक लोग अपनी गुजर-बसर के लिए समुद्री जीवों पर निर्भर हैं, लेकिन इस संपदा को बनाए रखने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। गैरकानूनी तरीके से मछलियां पकड़ने, प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्री जैव विविधता पर संकट गहराने लगा है। ऐसे में महासागरों के साथ ही वैश्विक आबादी के भविष्य को बचाने के लिए अब गंभीरता से प्रयास करना जरूरी हो गया है, क्योंकि सरकारों, व्यावसायिक संरक्षकों और मछुआरों के लिए प्राथमिकताएं तय कर दिए जाने के बावजूद मुनाफे की होड़ में कोई भी अपने दायित्व को समझने और उस पर पूरी तरह अमल करने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि एक तरफ अंधाधुंध तरीके से समुद्री जीवों का शिकार किया जा रहा है, तो दूसरी ओर समुद्र में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। | जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इस समस्या को और ज्यादा गंभीर बना रहा है। पेरिस समझौते में बढ़ते वैश्विक औसत तापमान में कमी लाने के लिए लक्ष्य निर्धारित होने के बावजूद भू-मध्यसागर का तापमान बढ़ने की गति वैश्विक औसत से बीस फीसद अधिक हो चुकी है। महासागरों की सेहत बचाने के प्रयासों को वास्तव में बल मिलता है या फिर केवल संकल्पों का पुलिंदा, यह देशों और समुदायों द्वारा पेश किए जाने वाले उपायों और समाधानों पर निर्भर है। महासागरों के उपयोग में बड़ा बदलाव केवल मछलियां पकड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तरीकों से भी जुड़ा हुआ है। इस समय साठ फीसद से अधिक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र क्षरण का शिकार है। एक आकलन के मुताबिक, वर्ष 2040 तक प्लास्टिक का प्रदूषण वर्तमान स्थिति से करीब दोगुना हो जाएगा। हर वर्ष महासागरों में जाने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा 2.3 से 3.7 करोड़ टन तक हो जाएगी।”
‘माइक्रोप्लास्टिक’ आज जल-जीवन ही नहीं, हमारे भोजनचक्र में भी शामिल हो गया है। दुनियाभर के वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसा प्लास्टिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका जैव अपघटन मुमकिन हो। यानी गल कर प्राकृतिक रूप से खत्म हो जाए। तोक्यो विश्वविद्यालय के ‘रिकेन सेंटर फार इमर्जेंट मैटर’ के शोधकर्ताओं ने एक नया पदार्थ तैयार किया है, जो बहुत जल्दी टूट जाता है और अपने पीछे कोई तलछट या अपशिष्ट नहीं छोड़ता। इससे पर्यावरण में मौजूद प्लास्टिक प्रदूषण को घटाने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं ने अभी इस पदार्थ को व्यापारिक तौर पर पेश करने की योजना नहीं बनाई है। यह नया पदार्थ उतना ही मजबूत है, जितना कि प्लास्टिक, लेकिन जब इसे नमक के संपर्क में लाया जाता है तो यह अपने मूल घटकों में तुरंत टूट जाता है। उन घटकों को फिर प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले जीवाणु खत्म कर देते हैं। इस तरह से इस प्रक्रिया में हानिकारक ‘माइक्रोप्लास्टिक’ नहीं बनता है। वैश्विक संगठन वर्ष 2030 तक महासागरों के तीस फीसद हिस्से को संरक्षित करने का लक्ष्य पूरा करना चाहते हैं। ऐसे में समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए एक बार इस्तेमाल में लाए जाने वाले प्लास्टिक को चरणबद्ध ढंग से हटाने और पुनर्चक्रण में तकनीकी प्रगति अब जरूरी पहलू हो गया है। खास जोर महत्त्वाकांक्षी जलवायु योजनाओं के साथ समुद्रों में जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई पर होना चाहिए, जो पेरिस जलवायु समझौते के 1.5 डिग्री लक्ष्य के अनुरूप हो। विश्वभर में जैसे-जैसे प्रवाल भित्तियों का क्षरण हो रहा है, वैसे ही मछलियों के भंडार दरक रहे हैं और समुद्री तापमान बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण,
पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश और समुद्री संसाधनों के अत्यधिक इस्तेमाल महासागरों को लेकर अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया है। अप्रैल 2025 में समुद्री सतह का तापमान अपने दूसरे सबसे ऊंचे स्तर को छू गया था। कैरीबियाई, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में यह देखा गया कि चिंताजनक रफ्तार से बड़े पैमाने पर मूंगा चट्टानों को नुकसान पहुंच रहा है। वे सफेद पड़ती जा रही हैं। उल्लेखनीय है कि प्रवाल भित्तियां समुद्री जीवों की करीब पच्चीस फीसद प्रजातियों को पोषित करती हैं।
ऐसे में पर्यटन तथा मछुआरा समुदाय के कारोबार ने नुकसान ही पहुंचाया है। इतना ही नहीं, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण निकलने वाले अत्यधिक ताप का करीब नब्बे फीसद हिस्सा महासागर ही अवशोषित करते हैं। यह मात्रा अब अपनी सीमाओं को छू रही है। इसी कारण कुछ वर्ष पूर्व विश्व व्यापार संगठन को अत्यधिक मात्रा में मछलियां पकड़ने पर लगाम लगाने के लिए एक समझौते के तहत सबसिडी पर रोक लगानी पड़ी थी। लंबे गतिरोध के बाद सदस्य देशों के बीच एक संधि पारित की गई, ताकि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में समुद्री जीवन को संरक्षित किया जा सके, लेकिन समुद्र विज्ञानियों का मानना है कि केवल कागजी नीतियों से पारिस्थितिकी तंत्र के समक्ष उपजे इस जोखिम को दूर नहीं किया जा सकता है। इन नीतियों पर प्रभावी तरीके से अमल करने की जरूरत है।
वैश्विक जनजीवन को पोषित करने में महासागरों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वे जलवायु आपदाओं से हमारी रक्षा करते हैं, लेकिन उनके संरक्षण के प्रयासों को गति देने में राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक संसाधनों का अभाव है। एक आकलन के मुताबिक, महासागरों के संरक्षण और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए सालाना करीब 175 अरब डालर की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में सिर्फ दस अरब डालर ही मुहैया हो पा रहे हैं। हर वर्ष करीब 1.2 करोड़ मीट्रिक टन प्लास्टिक महासागरों में समा जाता है। वैश्विक मछली भंडारण वर्ष 1970 में अपने सुरक्षित जैविक स्तर का 90 फीसद था, जो 2021 में घट कर 62 फीसद रह गया है। वर्ष 2017 के प्रथम महासागर सम्मेलन के बाद से अब तक हजारों स्वैच्छिक संकल्प व्यक्त किए जा चुके हैं, लेकिन नतीजे ढाक के तीन पात ही हैं। जैव विविधता संरक्षण पर वर्ष 2022 में हुए समझौते वर्ष 2030 तक कम से कम तीस फीसद समुद्री और पृथ्वी पर मौजूद पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर जोर दिया गया था। अब जरूरत है इस दिशा में प्रभावी तरीके से प्रयास करने और लक्ष्य हासिल करने की।
ग्यारह जून 2025 को फ्रांस में हुए जलवायु और पर्यावरण पर केंद्रित तीसरे संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन में एक आंकड़े ने सभी का ध्यान अपनी और खींचा है। इसमें कहा गया कि विश्व के कुल मछली भंडार का पैंतीस फीसद हिस्सा जिन तौर-तरीकों से पकड़ा जा रहा है, वे ठीक नहीं हैं। इस वजह से समुद्रों में मछलियों की संख्या में तेजी से गिरावट जारी है। अत्यधिक मात्रा में मछलियां पकड़ने, गहराता जलवायु संकट और समुद्री संसाधनों के कुप्रबंधन से महासागरों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। एक अध्ययन में 2,570 समुद्री मछली भंडारों पर केंद्रित डेटा विश्लेषण में बताया गया है कि कुल भंडारण में से एक तिहाई से ज्यादा मछलियों का शिकार किया जा रहा है। ऐसे में अब दुनिया भर में मत्स्य नीतियों पर नए सिरे पुनर्विचार की जरूरत है, ताकि वर्ष 2030 तक 30 फीसद महासागरीय क्षेत्र और पृथ्वी पर जलीय जीवों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट
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