विवाह समारोह-पवित्र संस्कार,आधुनिकता का दंश और समाज की चुनौती
शादी समारोहों में शराब, डीजे, नाइट पार्टी और वेस्टर्न कल्चर की नकल आम हो गई है।
विवाह एक पवित्र संस्कार, आध्यात्मिक और सामाजिक आयाम हैँ- बढ़ती आधुनिकता का दंश और बदलती शादी की परंपओं को रेखांकित करना जरूरी- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में शादी केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं बल्कि एक पवित्र संस्कार मानी जाती है। वेदों से लेकर पुराणों तक, गृहस्थ जीवन को धर्म का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवारों और दो कुलों का मिलन माना जाता है। इसीलिए इसे सात फेरे, सप्तपदी मंत्र, कन्यादान, होम, आशीर्वाद और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सम्पन्न कराया जाता है। किंतु आज बदलते समय में विवाह के स्वरूप में गहरा बदलाव दिखाई दे रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र मानता हूं कि शादी समारोह,जो कभी अध्यात्म, त्याग, संस्कार और सामाजिक सामंजस्य का प्रतीक था,अब धीरे-धीरे दिखावे, पैसे की होड़, दहेज, शराब और भव्यता की दौड़ में सिमटता जा रहा है। यह बदलाव न केवल भारतीय संस्कृति के लिए खतरे की घंटी है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सामने एक विकृत परंपरा स्थापित कर रहा है। इस विषय का विस्तार से डिस्कशन व विश्लेषण हम 5 प्वाइंटों के आधार पर करेंगे।
साथियों बात अगर हम विवाह एक पवित्र संस्कार: आध्यात्मिक और सामाजिक आयाम की करें तो,भारतीय संस्कृति में विवाह को सोलह संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार माना गया है। यह केवल पति-पत्नी के शारीरिक या भावनात्मक संबंध का बंधन नहीं है, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना का आधार है। विवाह का उद्देश्य केवल जीवनसाथी चुनना नहीं,बल्कि समाज में संतुलित,संस्कारित और धार्मिक जीवन की स्थापना करना है। सात फेरे, जिन्हें हर दंपति विवाह के समय अग्नि के साक्षी में लेता है, केवल शब्द नहीं हैं बल्कि जीवन के लिए आजीवन वचन हैं।आज की पीढ़ी इन मंत्रों और वचनों की गहराई को समझे बिना केवल विवाह को “सोशल इवेंट” की तरह देखने लगी है। होटल, रिजॉर्ट, फार्महाउस और डेस्टिनेशन वेडिंग ने विवाह को पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी के बजाय लक्ज़री इवेंट में बदल दिया है। यह बदलाव भारतीय समाज की मूल आत्मा के विपरीत है।

साथियों बात अगर हम आधुनिकता का दंश और बदलती शादी की परंपरा व दहेज और उपभोक्तावादी संस्कृति की करें तो आधुनिकता अपने साथ तकनीकी विकास,वैश्विक संपर्क और नए अवसर लाती है, परंतु इसका अंधानुकरण विवाह जैसे संस्कारों को विकृत कर रहा है। आज शादियाँ अधिकतर स्टेटस सिंबल बन गई हैं।(अ) लाखों- करोड़ों रुपए खर्च कर “शाही शादी” दिखाना अब फैशन बन चुका है। (ब) शादी समारोहों में शराब, डीजे, नाइट पार्टी और वेस्टर्न कल्चर की नकल आम हो गई है। (क़) रिश्तेदारों और मेहमानों का सम्मान अब मेन्यू की विविधता और सजावट की भव्यता से आंका जाने लगा है, न कि आत्मीयता और आदर से।इस भौतिकवादी दृष्टिकोण ने विवाह की पवित्रता को गहरे तक प्रभावित किया है। जहां कभी विवाह का अर्थ “दो आत्माओं का आध्यात्मिक बंधन” था, वहीं आज विवाह का अर्थ “सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो” बन गया है।दहेज और उपभोक्तावादी संस्कृति-विवाह का कुरूप चेहरा:-दहेज प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। स्वतंत्रता के बाद से लगातार प्रयासों के बावजूद यह कुरीति खत्म नहीं हुई। आधुनिकता और भौतिकतावाद ने इसे और मजबूत कर दिया है। आज शादी समारोह में गाड़ियों की डिमांड, महंगे गिफ्ट्स, कैश और प्रॉपर्टी की अपेक्षा खुलेआम की जाती है।दहेज न केवल विवाह के पवित्र बंधन को कलंकित करता है बल्कि यह महिलाओं के लिए अपमानजनक और अमानवीय स्थिति पैदा करता है। हजारों बेटियाँ आज भी दहेज के बोझ के कारण या तो शादी नहीं कर पातीं या शादी के बाद उत्पीड़न का शिकार होती हैं।
साथियों बात अगर हम विवाह और शराब संस्कृति, के तेजी से बढ़ते प्रचलन की करें तो, भारतीय समाज में विवाह हमेशा से संयम, मर्यादा और उत्सव का संगम रहा है। परंतु पिछले दो दशकों में शादियों में शराब की संस्कृति तेजी से फैली है। यह न केवल समारोह की गरिमा को कम करता है बल्कि कई बार हिंसा, विवाद और दुर्घटनाओं का कारण भी बनता है।आज समाज के सामने यह प्रश्न है कि क्या विवाह का उत्सव बिना शराब, नाच-गाने और दिखावे के संभव नहीं? विवाह जैसे पवित्र अवसर पर यदि आत्मसंयम और मर्यादा खो जाए तो वह केवल मनोरंजन बनकर रह जाता है।
साथियों बात अगर हम विवाह में बढ़ता दिखावापन और समाज पर असर की करें तो,”शादी में कितना खर्च हुआ?” यह प्रश्न आज समाज का सबसे बड़ा मूल्यांकन बन गया है। किसी परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा अब शादी की भव्यता से तय होती है। परिणामस्वरूप गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज, उधार और आर्थिक बोझ तले दब जाते हैं। (अ) शादियों में करोड़ों का खर्च करना “प्रेस्टीज इश्यू” बन चुका है। (ब) आम परिवार इस दौड़ में शामिल होने के लिए अपनी जिंदगी भर की कमाई खर्च कर देते हैं। (क़) और छोटे कस्बों में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, जिससे आर्थिक असमानता और बढ़ रही है।यह प्रवृत्ति भारतीय समाज के लिए खतरनाक है क्योंकि इससे सामाजिक संतुलन और समानता की अवधारणा को गहरी चोट पहुंचती है।
साथियों बात अगर हम घटते पारंपरिक संस्कार और अनुष्ठान की करें तो पहले विवाह घर-आंगन में, मंदिरों या पंचायतों में पूरे परिवार और समाज की सहभागिता से होते थे। बारात में ढोल-नगाड़े, लोकगीत,नृत्य, भजन- कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान का विशेष महत्व होता था। परंतु अब इनकी जगह डीजे, फिल्मी गाने और कोरियोग्राफ्ड डांस ने ले ली है।कन्यादान, होम, सप्तपदी, वरमाला जैसे संस्कार केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं।कई बार डेस्टिनेशनवेडिंग्स में पुरोहित और मंत्रोच्चार तक “फास्ट फॉरवर्ड” कर दिए जाते हैं। यह बदलाव कहीं न कहीं विवाह को केवल मनोरंजन का साधन बना रहा है।
साथियों बात अगर हम समाज को दिशा दिखाने कीआवश्यकता व सादगीपूर्ण विवाह की करें तो,आज समय की मांग है कि समाज इस बदलते परिदृश्य पर गंभीर चिंतन करे। विवाह को पुनः उसके मूल स्वरूप में लाने की आवश्यकता है। इसके लिए(अ)धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को विवाह संस्कारों की पवित्रता का प्रचार करना चाहिए। (ब) परिवारों को बच्चों को बचपन से ही विवाह संस्कारों की महत्ता सिखानी चाहिए।(क़) सरकार को दहेज और अनावश्यक खर्च पर रोक लगाने वाले कानूनों को कड़ाई से लागू करना चाहिए। (ड)समाज में “सादगीपूर्ण विवाह” को प्रोत्साहित करने वाले अभियान चलाने चाहिए।सादगीपूर्ण विवाह–भविष्य की राहआज कई राज्यों में “सामूहिक विवाह” और “सादगीपूर्ण विवाह” की परंपरा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें खर्च सीमित रखा जाता है और धार्मिक अनुष्ठानों को महत्व दिया जाता है। इससे न केवल आर्थिक बोझ कम होता है, बल्कि विवाह की सामाजिक और आध्यात्मिक महत्ता भी बनी रहती है।सादगीपूर्ण विवाह को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाना होगा। जब तक दिखावे और भव्यता को “प्रेस्टीज” माना जाएगा, तब तक यह प्रवृत्ति नहीं रुकेगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि विवाह भारतीय संस्कृति का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण संस्कार है। इसे आधुनिकता और दिखावे की भेंट चढ़ाना हमारी आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। समाज को यह समझना होगा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का पवित्र मिलन है, जिसका उद्देश्य धर्म, परंपरा और संस्कारों को आगे बढ़ाना है।यदि हम विवाह को पुनः उसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप में स्थापित कर पाते हैं, तभी हम आधुनिकता के दंश से बचकर आने वाली पीढ़ियों को एक सशक्त और संस्कारित समाज दे पाएंगे।