कोलकाता-राज्य के कानून मंत्रालय को पद से हटाकर सीएम ममता बनर्जी ने ली अपने हाथ में जिम्मेदारी
मंत्रालय छीनने के पीछे छिपी है ये अहम वजह
कोलकाता (BNE ):पश्चिम बंगाल में सियासी तपिश की लपटें दिखाई देने लगी है।इसी सियासी तपिश के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बेहद चौंकाने वाला फैसला लिया है। ‘दीदी’ ने अचानक अपनी कैबिनेट में बड़ा फेरबदल करते हुए राज्य के कानून मंत्रालय की अहम जिम्मेदारी सीधे अपने हाथों में ले ली है। अब तक ममता सरकार में यह महत्वपूर्ण विभाग मंत्री मलॉय घटक संभाल रहे थे, लेकिन सोमवार को अचानक उनसे यह प्रभार वापस ले लिया गया। राज्य सचिवालय की तरफ से साझा की गई जानकारी के मुताबिक, घटक के पास अब सिर्फ श्रम विभाग की ही जिम्मेदारी बचेगी। इसके अलावा बाबुल सुप्रियो के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद उनके सूचना प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक उद्यम जैसे विभागों का प्रभार भी खुद मुख्यमंत्री ने संभाल लिया है।
पांच साल के कामकाज से नाखुश थीं मुख्यमंत्री
सियासी गलियारों में बाबुल सुप्रियो के विभागों को अपने पास रखने की बात तो समझ आ रही है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ममता बनर्जी ने मलॉय घटक जैसे पुराने और अनुभवी नेता से कानून मंत्रालय क्यों छीन लिया? सूत्रों की मानें तो इसके पीछे कई बड़ी वजहें हैं। साल 2021 में तीसरी बार सरकार बनने के बाद मलॉय घटक को यह अहम जिम्मा सौंपा गया था, लेकिन पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री उनके कामकाज के तौर-तरीकों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थीं। यहां तक कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के अंदर भी घटक के रवैये को लेकर खासी नाराजगी पनप रही थी। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले विभाग छीनकर ममता बनर्जी ने पार्टी और सरकार में एक बेहद सख्त सियासी संदेश देने की कोशिश की है।
दागी छवि और जांच एजेंसियों का कसता शिकंजा
मलॉय घटक से कानून मंत्रालय छीने जाने की एक और सबसे बड़ी वजह उनका कथित कोयला तस्करी घोटाले में घिरना माना जा रहा है। इस मामले में वे लगातार प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई की रडार पर रहे हैं। जांच एजेंसियों के सामने पेश होने में उनके द्वारा की गई देरी ने भी बेवजह के विवादों को जन्म दिया। ऐसे दागी मंत्री के हाथ में कानून विभाग होने से सरकार की किरकिरी हो रही थी। दूसरी तरफ, पिछले कुछ दिनों में ईडी की छापेमारी और एफआईआर जैसे गंभीर मामलों में खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी दांव-पेच आजमाते हुए देखा गया था। इससे साफ है कि ममता कानूनी मामलों में किसी तरह की ढिलाई या दाग बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।
केंद्रीय एजेंसियों और राजभवन से सीधी टक्कर की तैयारी
आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए ममता बनर्जी अब पूरी तरह से ‘फ्रंटफुट’ पर खेल रही हैं। केंद्र की ओर से भेजी जा रही जांच एजेंसियों (ईडी और सीबीआई) की बढ़ती सक्रियता को लेकर ममता सरकार हमेशा से मुखर रही है। ऐसे में कानून मंत्रालय की कमान अपने हाथ में रखकर मुख्यमंत्री इन एजेंसियों के खिलाफ राज्य की कानूनी रणनीति को और अधिक आक्रामक और मजबूत बनाना चाहती हैं। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल के नए राज्यपाल आर एन रवि की नियुक्ति और चुनाव आयोग के सख्त रुख ने भी राज्य सरकार की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। विभाग अपने पास होने से नौकरशाही और कानूनी सलाहकारों पर सीधा नियंत्रण रहेगा, जो चुनाव के वक्त गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
2026 फतह के लिए ‘क्लीन इमेज’ पर फोकस
इस पूरे फेरबदल को 2026 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के एक बड़े हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। ममता बनर्जी अपनी कैबिनेट और संगठन में कसावट ला रही हैं ताकि भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे चेहरों को किनारे कर सरकार की छवि को सुधारा जा सके। यह एक्शन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मुख्यमंत्री चुनावी रण में उतरने से पहले कानूनी मोर्चे पर सरकार को एकदम चुस्त-दुरुस्त रखना चाहती हैं, ताकि विपक्ष या जांच एजेंसियों को सरकार पर हावी होने का कोई मौका न मिल सके।









