नई दिल्ली-इन 4 बैंकों में अपना हिस्सा कम करेगी सरकार
सेबी के नियम के तहत बढ़ानी होगी सार्वजनिक हिस्सेदारी
OFS और QIP के जरिए जुटाई जा सकती है पूंजी
हिस्सेदारी घटाने का मतलब निजीकरण नहीं
नई दिल्ली (BNE) : केंद्र सरकार चार सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाने की तैयारी कर रही है। इनमें सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक शामिल हैं। सरकार की योजना इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 75 प्रतिशत तक लाने की है, जिससे शेष 25 प्रतिशत शेयर आम निवेशकों और अन्य गैर-सरकारी शेयरधारकों के पास हो सकेंगे। इस कदम का उद्देश्य शेयर बाजार से जुड़े नियामकीय नियमों का पालन करना और निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना है।
‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले एक साल में इन चारों बैंकों में सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इसके लिए बैंक खुद बाजार से पूंजी जुटा सकते हैं। वहीं, बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए भी अपनी हिस्सेदारी के कुछ शेयर बेच सकती है।
सेबी के नियम के तहत बढ़ानी होगी सार्वजनिक हिस्सेदारी
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के नियमों के अनुसार, सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक शेयरधारिता बनाए रखना जरूरी है। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए इन सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी के पुनर्गठन की योजना पर काम किया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित बैंकों ने वित्त मंत्रालय से निर्धारित समयसीमा में छूट देते हुए एक साल का अतिरिक्त समय मांगा है। बैंकों का कहना है कि मौजूदा बाजार परिस्थितियों में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशंस प्लेसमेंट (QIP) के जरिए 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी बेचना आसान नहीं है। ऐसे में सरकार और बैंक शेयर बिक्री के लिए उपयुक्त समय तथा तरीका तय कर सकते हैं।
चारों बैंकों में सरकार की कितनी हिस्सेदारी?
इन चारों सरकारी बैंकों में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी फिलहाल काफी अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, हिस्सेदारी का विवरण इस प्रकार है:
इंडियन ओवरसीज बैंक: 92.44 प्रतिशत
यूको बैंक: 90.95 प्रतिशत
पंजाब एंड सिंध बैंक: 93.85 प्रतिशत
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया: 81.19 प्रतिशत
सरकार की हिस्सेदारी घटाने की योजना के तहत इन बैंकों में सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, प्रत्येक बैंक में कितने शेयर बेचे जाएंगे और बिक्री किस माध्यम से होगी, इस पर अंतिम निर्णय होना बाकी है।
OFS और QIP के जरिए जुटाई जा सकती है पूंजी
सरकार और बैंक सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।
ऑफर फॉर सेल (OFS): इसके तहत सरकार अपने मौजूदा शेयरों का एक हिस्सा शेयर बाजार में बेच सकती है। इससे बैंक की कुल जारी शेयर पूंजी में जरूरी नहीं कि बदलाव हो, लेकिन सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ सकती है।
क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशंस प्लेसमेंट (QIP): इसके जरिए बैंक पात्र संस्थागत निवेशकों को नए शेयर जारी करके पूंजी जुटा सकते हैं। यदि बैंक नए शेयर जारी करते हैं, तो सरकार की हिस्सेदारी प्रतिशत के रूप में कम हो सकती है, भले ही सरकार अपने शेयर सीधे न बेचे।
किस विकल्प को अपनाया जाएगा, यह बाजार की स्थिति, निवेशकों की मांग और संबंधित बैंक की पूंजी संबंधी जरूरतों पर निर्भर करेगा।
हिस्सेदारी घटाने का मतलब निजीकरण नहीं
सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी कम करने की योजना को निजीकरण से अलग समझना जरूरी है। हिस्सेदारी घटाकर 75 प्रतिशत करने का मतलब यह नहीं है कि इन बैंकों का नियंत्रण निजी कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। यदि सरकार के पास 75 प्रतिशत हिस्सेदारी रहती है, तो उसका बहुमत शेयरधारिता वाला दर्जा बरकरार रहेगा।
हालांकि, सरकारी बैंकों के निजीकरण को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है। नीति आयोग ने पूर्व में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक को निजीकरण के संभावित विकल्पों के रूप में सुझाया था। लेकिन इन बैंकों के निजीकरण को लेकर अंतिम निर्णय होने की पुष्टि नहीं है।
निवेशकों को क्या फायदा हो सकता है?
इन बैंकों में सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ने से आम निवेशकों और संस्थागत निवेशकों के लिए शेयर उपलब्धता बढ़ सकती है। सरकार यदि OFS के जरिए शेयर बेचती है, तो निवेशकों को बाजार में अतिरिक्त शेयर खरीदने का अवसर मिल सकता है। वहीं, QIP के जरिए पूंजी जुटाने से बैंकों की वित्तीय स्थिति और कारोबार विस्तार को समर्थन मिल सकता है।
हालांकि, केवल सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ने से शेयरों की कीमत बढ़ने की गारंटी नहीं होती। निवेश से पहले बैंक की वित्तीय स्थिति, मुनाफे, परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और बाजार जोखिमों का आकलन करना जरूरी है।
फिलहाल, सरकार की हिस्सेदारी घटाने की योजना के क्रियान्वयन, शेयर बिक्री के समय और अपनाए जाने वाले तरीकों को लेकर आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।








