
क्या कांग्रेस की खोई जमीन वापस ला पाएंगी आराधना मिश्रा?
पिता की छवि और छाया से बाहर निकलना ‘मोना’ की असल चुनौती
बृजेश चतुर्वेदी
कभी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं, उसकी राष्ट्रीय सत्ता की धुरी था। पं. गोविंद बल्लभ पंत से लेकर नारायण दत्त तिवारी तक की लंबी परंपरा ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की राजनीति का पर्याय बना दिया था। लेकिन मंडल और कमंडल की राजनीति ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। पिछड़ों के बीच समाजवादी राजनीति, दलितों में बसपा और हिंदुत्व की राजनीति के विस्तार ने कांग्रेस के पारंपरिक सामाजिक गठजोड़ को इस तरह तोड़ा कि पार्टी धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। 2022 में तो स्थिति यह हो गई कि 403 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक रह गए और वोट शेयर 2.3 प्रतिशत पर पहुंच गया।
कांग्रेस ने वापसी के कई प्रयास किए। 2009 में रीता बहुगुणा जोशी के दौर में लोकसभा की 21 सीटों पर जीत ने अचानक कांग्रेस को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया था। वह एक ऐसा क्षण था जब लगा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर खड़ी हो सकती है। मगर संगठन उस उभार को स्थायी जनाधार में नहीं बदल सका। राज बब्बर-शीला दीक्षित का प्रयोग हुआ, फिर प्रियंका गांधी ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के जरिए महिला मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश की। लेकिन 2022 में कांग्रेस दो सीटों पर सिमट गई।
2024 ने जरूर उम्मीद की एक खिड़की खोली। सपा के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और छह सीटें जीतीं। लेकिन यह सवाल अब भी जस का तस है कि क्या लोकसभा का यह उभार विधानसभा की जमीन में बदलेगा? यही वह परीक्षा है जिसके बीच आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है।
मोना के पास अनुभव की कमी नहीं। तीन बार ब्लॉक प्रमुख रहने के बाद वह रामपुर खास से लगातार चुनाव जीतती रही हैं। 2014 के उपचुनाव में विधानसभा पहुंचीं, 2017 और 2022 में सीट बचाई और कांग्रेस विधायक दल की नेता बनीं। प्रियंका गांधी के साथ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक अभियानों में उनकी सक्रिय भूमिका भी रही है। 2022 की उस भयावह कांग्रेस पराजय में भी वह पार्टी के केवल दो विजयी विधायकों में थीं।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत ही उनकी सबसे बड़ी चुनौती भी है प्रमोद तिवारी की बेटी होना।
प्रमोद तिवारी ने रामपुर खास को कांग्रेस का अभेद्य किला बनाया और नौ बार विधायक रहे। उनकी राजनीतिक पकड़ निर्विवाद रूप से मजबूत रही है, लेकिन कांग्रेस के भीतर उनके आलोचक उनकी समाजवादी पार्टी से निकटता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। 2013 में सपा ने कांग्रेस उम्मीदवार प्रमोद तिवारी को राज्यसभा पहुंचाने के लिए समर्थन दिया था। उस समय भी इसे मुलायम सिंह यादव और तिवारी के पुराने राजनीतिक रिश्ते के रूप में देखा गया था।
यही वह पृष्ठभूमि है, जिसमें कांग्रेस के भीतर एक धारणा यह भी रही कि तिवारी ने दूसरे दलों से अपने संबंध निभाने की कीमत कांग्रेस की स्वतंत्र राजनीति को चुकाकर अदा की। विरोधी इसे और तीखे शब्दों में ‘कांग्रेस को दूसरे दलों के हाथ बेच देने’ तक कहते रहे हैं। यह राजनीतिक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं, लेकिन आराधना मिश्रा के लिए इसे नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा।
क्योंकि अब विडंबना यह है कि जिस सपा से उनके पिता के राजनीतिक रिश्तों की चर्चा होती रही, उसी सपा के साथ 2027 के लिए सीटों के तालमेल की चुनौती भी उनके सामने है। कांग्रेस ने कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है, जबकि सपा की ओर से सीट बंटवारे पर अपने दावे सामने आ चुके हैं।
इसलिए मोना की असली परीक्षा सिर्फ भाजपा से मुकाबला करने की नहीं है। उन्हें यह साबित करना होगा कि वह प्रमोद तिवारी की बेटी भर नहीं, अपनी राजनीतिक जमीन रखने वाली प्रदेश अध्यक्ष हैं। उन्हें पुराने प्रभावशाली घराने की छाया से निकलकर नए जिलाध्यक्ष, नए ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ता और नए सामाजिक नेतृत्व को खड़ा करना होगा। कांग्रेस को ब्राह्मण-मुस्लिम-ओबीसी-दलित सामाजिक संतुलन के साथ नया आधार देने की कोशिश में इमरान मसूद, देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद जैसे चेहरों को नेतृत्व में जगह देना इसी दिशा का संकेत है।
आखिरकार सवाल यह नहीं है कि आराधना मिश्रा रामपुर खास बचा पाएंगी या नहीं—वह तो वह पहले ही साबित कर चुकी हैं। सवाल यह है कि क्या रामपुर खास की कांग्रेस को वह पूरे उत्तर प्रदेश की कांग्रेस बना पाएंगी?
कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अब एक और चेहरा नहीं, संगठन चाहिए; एक और चुनावी अभियान नहीं, लगातार जमीन पर मौजूदगी चाहिए और विरासत की राजनीति नहीं, नई पीढ़ी का भरोसा चाहिए।
मोना के सामने इतिहास की विडंबना यही है उन्हें अपने पिता की बनाई राजनीतिक विरासत को बचाना भी है और उसी विरासत की छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान भी बनानी है। अगर वह यह कर पाईं तो कांग्रेस की वापसी की कहानी सचमुच शुरू हो सकती है। अगर नहीं, तो उत्तर प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में उनका अध्यक्ष बनना भी पुराने प्रयोगों की सूची में एक और अध्याय बनकर रह जाएगा।
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