
विज्ञान पर बढ़ते हमले: सत्य और तर्क के सामने नई चुनौतियाँ
डॉ विजय गर्ग
मानव सभ्यता का इतिहास विज्ञान और तर्क की निरंतर प्रगति का इतिहास है। पहिये के आविष्कार से लेकर अंतरिक्ष अन्वेषण तक, टीकों से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, विज्ञान ने मानव जीवन को सुरक्षित, सुविधाजनक और समृद्ध बनाया है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस विज्ञान ने मानवता को अनगिनत संकटों से उबारा, आज वही विज्ञान कई दिशाओं से हमलों का सामना कर रहा है। चिंताजनक बात यह है कि विज्ञान पर यह हमला पहले की तुलना में अधिक संगठित, व्यापक और प्रभावशाली होता जा रहा है।
विज्ञान-विरोध कोई नई घटना नहीं
विज्ञान को हमेशा से चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। जब ने पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा करने की बात कही, तो उन्हें धार्मिक और सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा। जब ने विकासवाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया, तो अनेक समूहों ने उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
लेकिन अतीत में विज्ञान-विरोध प्रायः सीमित क्षेत्रों तक ही रहता था। आज स्थिति अलग है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने गलत सूचनाओं को अभूतपूर्व गति और पहुँच प्रदान कर दी है।
दुष्प्रचार का नया युग
डिजिटल युग में जानकारी का लोकतंत्रीकरण हुआ है, लेकिन इसके साथ ही भ्रम और झूठ का प्रसार भी बढ़ा है। सोशल मीडिया पर बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के स्वास्थ्य, पर्यावरण, जलवायु, चिकित्सा और तकनीक से जुड़ी अनेक भ्रामक बातें तेजी से फैलती हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान यह स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। वैज्ञानिक अनुसंधान और चिकित्सा सलाह के समानांतर झूठे उपचार, षड्यंत्र सिद्धांत और अफवाहें भी व्यापक रूप से फैलीं। कई बार लोगों ने विशेषज्ञों की बजाय अप्रमाणित स्रोतों पर अधिक विश्वास किया।
समस्या केवल गलत जानकारी की नहीं है, बल्कि यह भी है कि झूठ अक्सर सत्य से अधिक आकर्षक और सरल प्रतीत होता है।
जलवायु विज्ञान पर बढ़ते हमले
विज्ञान पर सबसे गंभीर हमलों में से एक जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में देखा जा सकता है। दशकों के वैज्ञानिक अनुसंधान यह दिखा चुके हैं कि पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और मानव गतिविधियाँ इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। फिर भी जलवायु विज्ञान को लेकर संदेह फैलाने के प्रयास जारी हैं।
कुछ समूह वैज्ञानिक निष्कर्षों को राजनीतिक या आर्थिक हितों के कारण चुनौती देते हैं। परिणामस्वरूप नीति-निर्माण में देरी होती है और पर्यावरणीय संकट और गहरा जाता है।
जब विज्ञान पर विश्वास कमजोर होता है, तो समाज भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की अपनी क्षमता भी कमजोर कर देता है।
वैज्ञानिकों पर व्यक्तिगत हमले
पहले वैज्ञानिक बहसें शोध-पत्रों और सम्मेलनों तक सीमित रहती थीं। अब कई वैज्ञानिकों को व्यक्तिगत हमलों, ऑनलाइन ट्रोलिंग और धमकियों का सामना करना पड़ता है।
विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषयों पर काम करने वाले विशेषज्ञ अक्सर संगठित विरोध का लक्ष्य बन जाते हैं। इससे वैज्ञानिक संवाद प्रभावित होता है और कई शोधकर्ता सार्वजनिक चर्चाओं में भाग लेने से हिचकने लगते हैं।
यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक समाजों के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि वैज्ञानिक विशेषज्ञता सार्वजनिक नीति का एक महत्वपूर्ण आधार होती है।
छद्म-विज्ञान का बढ़ता प्रभाव
विज्ञान पर हमले का एक और रूप छद्म-विज्ञान का प्रसार है। ऐसी धारणाएँ जो वैज्ञानिक भाषा का उपयोग तो करती हैं, लेकिन जिनके दावे प्रमाणों पर आधारित नहीं होते, तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं।
कई बार लोग वैज्ञानिक पद्धति और व्यक्तिगत अनुभव के बीच अंतर नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप अप्रमाणित दावे वैज्ञानिक तथ्यों के बराबर महत्व प्राप्त कर लेते हैं।
विज्ञान की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह अपने निष्कर्षों को प्रमाणों के आधार पर बदल सकता है। लेकिन छद्म-विज्ञान अक्सर निश्चित उत्तरों और चमत्कारी समाधानों का वादा करता है, जो लोगों को आकर्षित करते हैं।
शिक्षा की भूमिका
विज्ञान पर बढ़ते हमलों का सबसे प्रभावी उत्तर बेहतर विज्ञान शिक्षा है। केवल वैज्ञानिक तथ्यों को याद करवाना पर्याप्त नहीं है; लोगों को यह समझना भी आवश्यक है कि विज्ञान काम कैसे करता है।
वैज्ञानिक पद्धति, आलोचनात्मक चिंतन, प्रमाणों का मूल्यांकन और स्रोतों की विश्वसनीयता को समझना आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
यदि नागरिक यह पहचानने में सक्षम हों कि कौन-सी जानकारी विश्वसनीय है और कौन-सी नहीं, तो दुष्प्रचार का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विज्ञान और समाज का संबंध
विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। यह हमारे भोजन, स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, ऊर्जा और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। इसलिए विज्ञान पर हमला अंततः समाज के हितों पर हमला बन जाता है।
जब लोग वैज्ञानिक संस्थाओं पर भरोसा खो देते हैं, तो टीकाकरण कार्यक्रमों, पर्यावरणीय नीतियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों की प्रभावशीलता भी प्रभावित होती है। इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है।
निष्कर्ष
विज्ञान पर हमला वास्तव में पहले से अधिक गंभीर और जटिल हो गया है। दुष्प्रचार, छद्म-विज्ञान, राजनीतिक ध्रुवीकरण और डिजिटल माध्यमों पर फैलती गलत जानकारी ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि विज्ञान की शक्ति उसकी आत्म-सुधार क्षमता, प्रमाण-आधारित दृष्टिकोण और सत्य की खोज में निहित है।
आज आवश्यकता विज्ञान को अंधविश्वास की तरह स्वीकार करने की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच को अपनाने की है। प्रश्न पूछना, प्रमाण मांगना और तर्क के आधार पर निष्कर्ष निकालना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सार है। यदि समाज इस दृष्टिकोण को मजबूत करता है, तो विज्ञान पर होने वाले हमलों का सामना भी अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
आखिरकार, विज्ञान केवल ज्ञान का संग्रह नहीं है; यह मानवता का वह उपकरण है जो हमें भ्रम से सत्य की ओर, और अज्ञानता से प्रगति की ओर ले जाता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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