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परमाणु प्रसार को रोकने की जंग या उसे तेज करने की भूल?

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परमाणु प्रसार को रोकने की जंग या उसे तेज करने की भूल?

(पश्चिम एशिया की समकालीन परिस्थितियों में यह प्रश्न कि क्या परमाणु प्रसार को रोकने के लिए किए गए सैन्य हस्तक्षेप वास्तव में उसे और अधिक तीव्र बना देते हैं।) 
— डॉ. सत्यवान सौरभ
परमाणु हथियारों का प्रसार आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य यह रहा है कि परमाणु हथियारों का विस्तार सीमित रखा जाए और नए देशों को इस श्रेणी में प्रवेश करने से रोका जाए। इसी उद्देश्य से अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियाँ, निगरानी तंत्र और कूटनीतिक पहलें अस्तित्व में आईं। इसके बावजूद समय-समय पर यह विचार सामने आता रहा है कि यदि किसी देश के परमाणु कार्यक्रम से वैश्विक या क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो रहा हो, तो उसे रोकने के लिए निवारक या पूर्व-emptive युद्ध का सहारा लिया जा सकता है। परंतु आलोचकों का तर्क है कि इस प्रकार के सैन्य हस्तक्षेप कई बार उस समस्या को हल करने के बजाय और जटिल बना देते हैं, क्योंकि वे अन्य देशों को भी परमाणु हथियार हासिल करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। पश्चिम एशिया में हाल के दशकों की घटनाएँ इस बहस को और अधिक प्रासंगिक बनाती हैं।
निवारक युद्ध की अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि संभावित खतरे को उसके पूर्ण रूप लेने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए। यदि किसी देश के पास परमाणु हथियार बनने की क्षमता विकसित हो रही है, तो कुछ शक्तियाँ यह मान सकती हैं कि सैन्य कार्रवाई करके उस कार्यक्रम को नष्ट कर देना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है। इस रणनीति का तर्क यह है कि यदि खतरे को प्रारंभिक चरण में ही समाप्त कर दिया जाए, तो भविष्य में बड़े युद्ध या विनाश से बचा जा सकता है। परंतु व्यवहार में यह नीति कई बार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती।
पश्चिम एशिया इस संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यहाँ लंबे समय से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, धार्मिक-सांप्रदायिक तनाव, ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण और बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप जैसे अनेक कारक मौजूद हैं। इस क्षेत्र में परमाणु हथियारों की संभावना को लेकर लगातार चिंता बनी रही है। कुछ देशों के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में संदेह और बहस दोनों रहे हैं। ऐसे माहौल में निवारक युद्ध या सैन्य कार्रवाई का विचार अक्सर चर्चा में आता है।
इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ संभावित परमाणु खतरे को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई की गई। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य यह था कि संबंधित देश के परमाणु बुनियादी ढाँचे को नष्ट करके उसे हथियार विकसित करने से रोका जाए। प्रारंभिक दृष्टि में यह रणनीति प्रभावी प्रतीत हो सकती है, क्योंकि इससे परमाणु कार्यक्रम को तत्काल नुकसान पहुँचता है। लेकिन दीर्घकालिक प्रभावों को देखें तो स्थिति अधिक जटिल दिखाई देती है।
पहला महत्वपूर्ण पहलू यह है कि निवारक युद्ध किसी देश में असुरक्षा और अविश्वास की भावना को बढ़ा सकता है। यदि किसी राज्य को यह लगता है कि उसकी संप्रभुता और सुरक्षा को बाहरी शक्तियों से लगातार खतरा है, तो वह अपनी रक्षा को मजबूत करने के लिए अधिक आक्रामक कदम उठा सकता है। ऐसे में परमाणु हथियारों को “अंतिम सुरक्षा गारंटी” के रूप में देखा जाने लगता है। परिणामस्वरूप वह देश अपने परमाणु कार्यक्रम को और अधिक गुप्त तथा तेज गति से आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।
दूसरा पहलू क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन से जुड़ा है। पश्चिम एशिया में कई देश एक-दूसरे के प्रति अविश्वास और प्रतिस्पर्धा की भावना रखते हैं। यदि किसी देश के खिलाफ निवारक सैन्य कार्रवाई होती है, तो अन्य देशों को भी यह आशंका हो सकती है कि भविष्य में उनके साथ भी ऐसा हो सकता है। इससे वे अपनी सुरक्षा नीति में परमाणु विकल्प को अधिक गंभीरता से लेने लगते हैं। इस प्रकार एक देश के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरे क्षेत्र में परमाणु प्रसार की दौड़ को तेज कर सकती है।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक व्यवस्था से संबंधित है। निवारक युद्ध अक्सर विवादास्पद होता है, क्योंकि इसमें संभावित खतरे के आधार पर सैन्य कार्रवाई की जाती है, जबकि खतरा अभी पूरी तरह वास्तविक नहीं होता। यदि शक्तिशाली देश इस सिद्धांत को बार-बार लागू करते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अस्थिरता पैदा कर सकता है। अन्य देश भी अपने सुरक्षा हितों के नाम पर इसी प्रकार की कार्रवाइयों को उचित ठहराने लग सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर संघर्ष और अविश्वास बढ़ सकता है।
पश्चिम एशिया की समकालीन परिस्थितियों में यह बहस और भी जटिल हो जाती है। क्षेत्र में कई ऐसे देश हैं जो सुरक्षा चुनौतियों, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और बाहरी हस्तक्षेपों से घिरे हुए हैं। कुछ देशों के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहन निगरानी और कूटनीतिक प्रयास चल रहे हैं। लेकिन समय-समय पर यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि यदि कूटनीति विफल हो जाती है, तो सैन्य विकल्प अपनाया जा सकता है। यही वह स्थिति है जहाँ यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या निवारक युद्ध वास्तव में समस्या का समाधान है।
आलोचकों का कहना है कि सैन्य कार्रवाई अक्सर अल्पकालिक समाधान देती है, जबकि दीर्घकाल में वह समस्या को और गहरा कर सकती है। जब किसी देश के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला होता है, तो इससे राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा की भावना को चोट पहुँचती है। इससे उस देश की जनता और राजनीतिक नेतृत्व में यह विश्वास मजबूत हो सकता है कि परमाणु हथियार ही बाहरी दबाव से बचने का सबसे प्रभावी साधन हैं। इस प्रकार निवारक युद्ध उस उद्देश्य के विपरीत परिणाम दे सकता है, जिसके लिए उसे किया गया था।
इसके अलावा, आधुनिक समय में परमाणु कार्यक्रम केवल एक या दो स्थलों तक सीमित नहीं होते। वे कई संस्थानों, वैज्ञानिकों और तकनीकी क्षमताओं के व्यापक नेटवर्क पर आधारित होते हैं। इसलिए किसी एक प्रतिष्ठान को नष्ट करने से पूरे कार्यक्रम को समाप्त करना संभव नहीं होता। अक्सर ऐसा होता है कि हमले के बाद संबंधित देश अपने कार्यक्रम को और अधिक सुरक्षित तथा गुप्त रूप से विकसित करने लगता है। इससे अंतरराष्ट्रीय निगरानी और नियंत्रण और कठिन हो जाते हैं।
हालाँकि यह भी सत्य है कि कुछ परिस्थितियों में निवारक कार्रवाई को सुरक्षा के दृष्टिकोण से आवश्यक माना जाता है। यदि किसी राज्य के पास परमाणु हथियार बनने की क्षमता अत्यंत निकट हो और वह क्षेत्रीय या वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा हो, तो कुछ देश यह तर्क दे सकते हैं कि सैन्य हस्तक्षेप अपरिहार्य है। लेकिन इस प्रकार की कार्रवाई को अंतिम विकल्प के रूप में ही देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसके परिणाम व्यापक और अनिश्चित हो सकते हैं।
इस संदर्भ में कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परमाणु प्रसार को रोकने के लिए केवल सैन्य शक्ति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विश्वास निर्माण, पारदर्शिता, निरीक्षण तंत्र और आर्थिक-राजनीतिक प्रोत्साहनों के माध्यम से भी देशों को परमाणु हथियारों की दौड़ से दूर रखा जा सकता है। पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि यहाँ किसी भी सैन्य टकराव के व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक परिणाम हो सकते हैं।
इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में भी गंभीर प्रयास करे। यदि केवल कुछ देशों के पास परमाणु हथियार बने रहें और अन्य देशों को उनसे दूर रहने के लिए कहा जाए, तो यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकती। वैश्विक स्तर पर समान और न्यायसंगत सुरक्षा व्यवस्था ही परमाणु प्रसार को प्रभावी ढंग से रोक सकती है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि निवारक युद्ध की रणनीति परमाणु प्रसार को रोकने का एक विवादास्पद और जोखिमपूर्ण तरीका है। पश्चिम एशिया की समकालीन परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि सैन्य हस्तक्षेप कई बार समस्या को हल करने के बजाय उसे और जटिल बना देता है। इससे क्षेत्रीय असुरक्षा बढ़ सकती है, अविश्वास गहरा सकता है और अन्य देशों को भी परमाणु हथियार विकसित करने की प्रेरणा मिल सकती है। इसलिए परमाणु प्रसार की चुनौती से निपटने के लिए दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें कूटनीति, सहयोग और वैश्विक संस्थागत ढाँचे की केंद्रीय भूमिका हो।
यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में गंभीर है, तो उसे यह समझना होगा कि परमाणु प्रसार जैसी जटिल समस्या का समाधान केवल सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि संवाद, विश्वास और न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था से ही संभव है।

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