विश्वविद्यालय, सत्ता और साहित्य की अपमानित गरिमा
– डॉ. प्रियंका सौरभ
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ हुआ सार्वजनिक दुर्व्यवहार केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के अकादमिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराते संकट का स्पष्ट संकेत है। किसी आमंत्रित लेखक को मंच पर अपमानित करना और कार्यक्रम से बाहर जाने के लिए कहना उस परंपरा के सर्वथा विपरीत है, जिसमें विश्वविद्यालयों को विचारों के मुक्त आदान–प्रदान, असहमति के सम्मान और रचनात्मक संवाद के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है। यह घटना व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं है; यह साहित्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बौद्धिक गरिमा पर सीधा आघात है।
विश्वविद्यालयों की ऐतिहासिक भूमिका सत्ता के अनुचर बनने की नहीं रही है। नालंदा और तक्षशिला जैसी प्राचीन ज्ञान-परंपराओं से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, इन संस्थानों ने सदैव प्रश्न पूछने, तर्क करने और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने की संस्कृति को बढ़ावा दिया है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाली मशीनें नहीं होते, बल्कि वे समाज की चेतना को दिशा देने वाले केंद्र होते हैं। यहां विचारों की विविधता, मतभेद और बहस को कमजोरी नहीं, बल्कि बौद्धिक शक्ति माना जाता है। ऐसे में जब किसी विश्वविद्यालय के भीतर सत्ता-प्रदर्शन, अहंकार और असहिष्णुता का दृश्य सामने आता है, तो यह केवल एक कार्यक्रम की विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत मूल्यों के क्षरण का प्रमाण बन जाता है।
मनोज रूपड़ा समकालीन हिन्दी कथा साहित्य का एक सशक्त और प्रतिष्ठित नाम हैं। उनकी कहानियाँ और उपन्यास सत्ता, समाज और व्यक्ति के जटिल संबंधों को बेबाकी से उजागर करते हैं। वे उन लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम माना है। ऐसे लेखक को आमंत्रित करना स्वयं विश्वविद्यालय की बौद्धिक प्रतिबद्धता और खुलेपन का प्रतीक होना चाहिए था। किंतु उनके साथ हुआ व्यवहार यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं आलोचनात्मक दृष्टि और स्वतंत्र विचार से असहजता ने विवेक पर विजय पा ली। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या विश्वविद्यालय अब केवल औपचारिक आयोजनों, प्रशस्ति-पाठों और सत्ता-अनुकूल वक्तव्यों तक सीमित रह जाएंगे?
कुलपति जैसे पद से केवल प्रशासनिक दक्षता की नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व और अकादमिक संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है। यह पद संयम, संवाद और समावेशन का प्रतीक होना चाहिए। विश्वविद्यालय का मुखिया यदि आलोचना या असहमति को व्यक्तिगत चुनौती मानने लगे, तो उसका प्रभाव केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता। भय का वातावरण धीरे-धीरे पूरे परिसर में फैलने लगता है। शिक्षक खुलकर बोलने से कतराने लगते हैं, विद्यार्थी प्रश्न पूछने से डरने लगते हैं और रचनात्मकता आत्म-सेंसरशिप की भेंट चढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है और ज्ञान का केंद्र होने के बजाय अनुशासन और नियंत्रण का उपकरण बन जाता है।
इस घटना का एक और चिंताजनक पक्ष यह है कि संस्थागत स्तर पर आमंत्रित साहित्यकार के सम्मान की रक्षा के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता और दृढ़ता दिखाई नहीं दी। साहित्यिक आयोजनों की सफलता केवल मंच-सज्जा, पोस्टरों और औपचारिक भाषणों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां संवाद कितना खुला, सम्मानजनक और अर्थपूर्ण रहा। जब किसी लेखक का अपमान होता है और संस्था मौन साध लेती है, तो वह मौन भी एक प्रकार की स्वीकृति बन जाता है। यह चुप्पी भविष्य में और अधिक दमनकारी व्यवहारों को प्रोत्साहित करती है और संस्थान की नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
यह याद दिलाना आवश्यक है कि विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति या पदाधिकारी की निजी जागीर नहीं होते। वे सार्वजनिक संसाधनों, करदाताओं के धन और समाज के विश्वास से संचालित होते हैं। यहां लिए गए निर्णय और प्रदर्शित व्यवहार समाज के लिए संदेश का काम करते हैं। यदि विश्वविद्यालयों में सत्ता का मद, व्यक्तिगत अहंकार और असहिष्णुता हावी हो जाए, तो समाज में संवाद की जगह टकराव और भय की संस्कृति पनपने लगती है। यह प्रवृत्ति न केवल साहित्य और शिक्षा के लिए, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी घातक है, क्योंकि लोकतंत्र का आधार ही विचारों की बहुलता और असहमति का सम्मान है।
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में साहित्य और बौद्धिक विमर्श की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज़ादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक सुधार आंदोलनों तक, लेखकों और विचारकों ने सत्ता से सवाल पूछे हैं और समाज को आत्मावलोकन के लिए प्रेरित किया है। यदि आज विश्वविद्यालयों में ही लेखकों और विचारकों को अपमानित किया जाएगा, तो यह उस परंपरा का घोर अपमान होगा जिसने हमें एक जीवंत लोकतांत्रिक समाज बनाया है। यह विडंबना ही है कि जिन संस्थानों से वैचारिक नेतृत्व की अपेक्षा की जाती है, वही यदि असहिष्णुता का उदाहरण प्रस्तुत करने लगें, तो समाज किस दिशा में जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम में यह अवश्य उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापकों ने स्थिति को संभालने और सम्मानजनक समाधान खोजने का प्रयास किया। यह दर्शाता है कि संस्थान के भीतर अभी भी विवेक और संवेदनशीलता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। किंतु यह भी सत्य है कि जब सत्ता का मद विवेक पर हावी हो जाता है, तब व्यक्तिगत प्रयास अक्सर निष्प्रभावी सिद्ध होते हैं। संस्थागत संस्कृति तभी बदलती है, जब नेतृत्व स्वयं संवाद और आत्मालोचना के लिए तैयार हो।
यह घटना हमें साहित्यकारों और बौद्धिक वर्ग की भूमिका पर भी पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती है। जब किसी लेखक के साथ अन्याय होता है और पूरा साहित्यिक समुदाय मौन साध लेता है, तो यह मौन स्वयं में एक राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य बन जाता है। इतिहास साक्षी है कि चुप्पी ने हमेशा सत्ता को मजबूत किया है और प्रतिरोध को कमजोर। यदि आज इस घटना पर स्पष्ट और सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं होगी, तो कल किसी और लेखक, किसी और विचार और किसी और मंच पर यही दुहराया जाएगा।
साहित्य का मूल स्वभाव प्रश्नाकुलता और प्रतिरोध का है। वह सत्ता के समक्ष नतमस्तक होने के लिए नहीं, बल्कि उसे आईना दिखाने के लिए पैदा हुआ है। यदि साहित्यकार ही अपने सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए खड़े नहीं होंगे, तो साहित्य धीरे-धीरे केवल करियर और पुरस्कारों तक सिमट जाएगा। तब वह समाज की आत्मा नहीं, बल्कि व्यवस्था का सजावटी उपकरण बनकर रह जाएगा।
आज आवश्यकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक, विद्यार्थी और साहित्यिक समाज इस घटना से सबक लें। विश्वविद्यालयों को आत्ममंथन करना होगा कि वे किस प्रकार के अकादमिक वातावरण को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या वे संवाद और बहस को प्रोत्साहित कर रहे हैं, या भय और आज्ञाकारिता को? साहित्यिक आयोजनों को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत वैचारिक मंच के रूप में देखना होगा, जहां असहमति भी सम्मान के साथ व्यक्त की जा सके।
यह घटना शर्मनाक है और इसकी कड़ी निंदा आवश्यक है, लेकिन निंदा से आगे बढ़कर ठोस आत्मालोचना और सुधार की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी आमंत्रित लेखक या वक्ता के साथ ऐसा व्यवहार न हो। अकादमिक स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा केवल कागजी नीतियों से नहीं, बल्कि व्यवहार और संस्कृति से होती है।
अंततः प्रश्न केवल मनोज रूपड़ा या किसी एक कार्यक्रम का नहीं है। प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार के विश्वविद्यालय और किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं। यदि हम विचार से डरेंगे, प्रश्न से घबराएंगे और असहमति को अपमान से दबाने की कोशिश करेंगे, तो हम एक जीवंत लोकतंत्र की जगह एक भयग्रस्त समाज की ओर बढ़ेंगे। विश्वविद्यालयों को यह याद रखना होगा कि उनका अस्तित्व सत्ता की कृपा से नहीं, बल्कि ज्ञान, संवाद और स्वतंत्र चेतना से है। यदि यही चेतना कुचल दी गई, तो विश्वविद्यालय केवल इमारतें रह जाएंगे—ज्ञान के नहीं, बल्कि मौन के स्मारक।