
बुजुर्गों को बोझ समझने की बढ़ती प्रवृत्ति-विजय गर्ग
जिन चौखटों पर कभी मां-बाप की आहटें जीवन को सुकून देती थीं। जहां उनके साये में पीढ़ियां संवरती थीं, आज वही चौखटें बुजुर्गों के लिए अजनबी हो गई हैं। अपने ही घर के दरवाजों से अब उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाला जा रहा है। यह कोई भावुक या कोरी कल्पना नहीं, बल्कि वर्तमान का शर्मनाक यथार्थ है।
हाल ही में मुंबई में एक कैंसर पीड़ित 70 वर्षीय वृद्धा को उसके ही पोते ने ‘आरे कालोनी’ के जंगल में छोड़ दिया। पुलिस को वह महिला कचरे के ढेर पर पड़ी मिली, बदहवास, भूखी और अपनी आखिरी सांसें लेती हुई। पुलिस ने ‘माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम’ के तहत आरोपी पोते को गिरफ्तार किया। यह अकेली घटना नहीं है जो हमें झकझोरती हो। पुणे में एक बेटे ने अपने वृद्ध पिता को घर से बाहर निकाल दिया, पालघर ‘बेटों ने अपने ही बुजुर्ग माता-पिता को पीटकर संपत्ति हड़प ली। ये घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं।
भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। देश की जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा बुजुर्गों का है, और वर्ष 2050 तक यह अनुपात 17 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है। यानी हर छठा भारतीय बुजुर्ग होगा, पर क्या बुजुर्ग को सम्मान से जीने का हक मिलेगा ? वृद्धाश्रम भरते जा रहे हैं, वहीं बेटों के घरों में खालीपन है। आधुनिकता के नाम पर यह कैसा आत्महीन समाज बन रहा है जो अनुभव, ममता और त्याग को बोझ मानने लगा है ? यह केवल पारिवारिक रिश्तों की टूटन नहीं, हमारी सामूहिक चेतना की गिरावट है। जिस भारत को हम विकसित कहने लगे हैं, वहां तकनीक की रोशनी तो है, पर संवेदनाओं का अंधकार भी गहराता जा रहा है। अब हम एक ऐसे यंत्रवत समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां संवेदना केवल पाठ्यक्रमों और स्मारकों में मिलेगी।
बुजुर्गों की यह स्थिति अचानक नहीं हुई है। यह उस सांस्कृतिक पतन की परिणति है, जहां ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ को तिलांजलि दे दी गई। पहले संयुक्त परिवार थे – अनेक दिल, एक घर एकल परिवारों में कमरे हैं, अपनापन नहीं । स्मार्टफोन की रोशनी है, लेकिन मां की आंखों की झिलमिलाहट कहीं खो गई है। जो दादी कहानियां सुनाती थीं, वे अब एकांत में आंसू पोछ रही हैं। यह केवल बुजुर्गों की नहीं, हमारी सामाजिक चेतना की पराजय है।
समझना होगा कि ‘विकास’ केवल जीडीपी नहीं, मानवीय गरिमा में निहित है। हमें उन धूल भरी चौखटों की ओर फिर से लौटना होगा, जहां मां की थाली में सबसे बड़ा रोटी का टुकड़ा बापू के हिस्से आता था, और दादी की हंसी सबसे सस्ती दवा थी। अब समय आ गया है। कि हम ‘बड़ों के सम्मान’ को फिर से जीवंत व्यवहार बनाएं। वरना एक दिन हमारे बच्चे भी हमें उसी जंगल में छोड़ आएंगे, जहां आज हम अपने माता-पिता को बेबस छोड़ते देख रहे हैं।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
Post Views: 74