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चिंतन- जूता प्रकरण

चिंतन- जूता प्रकरण जो हुआ वो गलत हुआ, पर हुआ ही क्यों? इस पर भी चिंतन जरूरी! सुशील कुमार 'नवीन'  सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को जो हुआ, वह पूर्णतः गलत हुआ। ऐसा नहीं होना चाहिए था। लोकतांत्रिक देश में विरोध के तरीके और भी बहुत हैं। देश की सर्वोच्च न्याय संस्था के मुखिया के साथ इस तरह की हरकत सीधे-सीधे न्याय प्रकिया पर हमला है। सीजेआई ने भी उदार हृदय दिखाकर नया उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो निसंदेह न्यायिक अधिकारी के सरल स्वभाव की नई नजीर बनेगा। निसंदेह इस तरह की घटना नहीं होनी चाहिए, पर अब जब हो ही गई तो अब इस पर भी चिंतन जरूरी है।     न्यायालय देश के प्रत्येक उस व्यक्ति की सबसे बड़ी उम्मीद है जो हर तरह की व्यवस्था से आहत है। जब कोई सुनवाई नहीं हो रही हो। न प्रशासन सुन रहा हो और न सरकार। तब उम्मीद की एकमात्र रोशनी की किरण यहीं से प्राप्त होने की होती है। न्यायालय द्वारा कहा गया हर एक शब्द पत्थर की लकीर होता है। हर एक शब्द अक्षय बन जाता है। हजारों, लाखों नाउम्मीद लोगों को उस एक शब्द से न्याय की आस बंध जाती है। तभी तो साफ सुनने को मिलता है कि कोई बात नहीं यहां सुनवाई नहीं हुई, कोर्ट तो मेरी बात सुनेगा।     भारत एक धर्मपरायण देश है। विभिन्न प्रकार की धार्मिक आस्थाओं का यहां प्रभाव है। देश का बहुत बड़ा तबका धर्म-कर्म के सार्थक-निरर्थक कथन पर खड़ा होने में देर नहीं लगाता। धर्म के प्रति समर्पण हमारा सामान्य स्वभाव है। भगवतगीता में कहा गया है कि - श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:, ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति। भाव है कि श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधनपारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति को प्राप्त होते हैं। इसी तरह चाणक्य नीति का प्रसिद्ध श्लोक है – यो धर्मं सत्त्वसंपन्नं सततं चानुपश्यति न स पापेषु लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा॥” जो व्यक्ति सत्त्वसंपन्न होकर हमेशा धर्म का पालन करता है, वह कमल के पत्ते की तरह जल से अछूता रहता है, उसी तरह वह पापों में नहीं लिप्त होता।  आचार्य चाणक्य के अनुसार, धर्म मनुष्य का स्वाभाविक कर्तव्य और नैतिक आचरण है, जो उसे समाज में अपनी भूमिका निभाने और दूसरों के लिए सही कार्य करने में मदद करता है। धर्म के बिना जीवन निरर्थक है और इसके द्वारा व्यक्ति अपने यश को अमर कर सकता है, क्योंकि धर्म ही उसे मृत्यु के बाद भी जीवित रखता है। सत्य, प्रिय और हितकर वाणी का प्रयोग ही धर्म है, और दान-पुण्य तथा अपने कर्तव्यों का निर्वहन ही वास्तविक धर्म है। ऐसे में धर्म के प्रति देश में अगाध आस्था है। इसके देश में बहुत से उदाहरण हैं।     युनेस्को की विश्व धरोहरों में अपना विशेष स्थान रखने वाले खजुराहो के एक मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति के पुनर्निर्माण की याचिका पर सीजेआई के बयान में कितनी सच्चाई है। इस पर चर्चा करना अब बेमानी है। पर जिस तह से इसका प्रसार हुआ इससे धर्मप्रेमियों में नाराजगी की कोई कमी नही रही। हालांकि यहां यह भी बात गौर करने लायक है कि बयान से विवाद खड़ा होने के बाद सीजेआई ने भी स्पष्ट रूप से कहा कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियां इस संदर्भ में थीं कि वह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकार क्षेत्र में आता है।       यहां एक बात का ध्यान रखना आज समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जमाना आज सोशल मीडिया का है। मिनटों में एक शब्द पर बवाल हो जाता है। बिना जांचे परखे व्यूज के चक्कर में फॉरवर्ड करने की गति सूर्य की रोशनी से भी तेज गति पकड़ लेती है। जब तक सत्यता सामने आए तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है। जब बात समाज या धर्म की हो तो उसका लाभ लेने वालों की कोई कमी नहीं। आपदा में अवसर की तरह सुप्तप्राय शक्तियां निद्रा त्याग पक्ष-विपक्ष दो धड़ों में खड़ी होने में देर नहीं लगाती हैं। इसलिए निवेदन न्याय प्रणाली से भी है कि जब बात किसी आस्था या धर्म की हो तब शब्दों का चयन किसी तरह के विवाद को जन्म देने वाला न हो। शब्दों का बहुत बड़ा भंडार है। संस्कृत के महाकवि भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम् की ये पंक्तियां आज के समय पर बड़ी सार्थक प्रतीत होती है। विदधीत् न क्रियामविवेकः सहसा परमापदां पदम्। इसके अनुसार किसी कार्य को अनायास नहीं करना चाहिए। जल्दबाजी आपदाओं का परम या आश्रय स्थान होती है। लेखक: सुशील कुमार 'नवीन' ...

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