लखनऊ ट्रेनों की बदहाली दूर करना नहीं बना कभी चुनावी मुद्दा

Posted at : 2019-04-14 08:07:14

लखनऊ आउटरों पर खड़ी होकर देरी से राजधानी पहुंचने वाली ट्रेनें रेल यात्रियों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है। इसमें मेल और एक्सप्रेस व सुपरफास्ट ट्रेनें शामिल हैं। पैसेंजर और मेमू ट्रेनों की हालत और भी बदतर है। इन ट्रेनों में तो गंदगी का अंबार लगा रहता है। बिना ट्रेन की सफाई के ही इसे गंतव्य के लिए रवाना कर दिया जाता है। इनके शौचालय गंदगी से पटे हैं। लोकसभा में खड़े होने वाले प्रत्याशियों के लिए यह कभी चुनावी मुद्दा बना ही नहीं। ब्रिटिश काल में बने इस स्टेशन पर शुरुआत में तीन लाइनें थीं। धीरे धीरे इसका विस्तार हुआ और दो लाइन और बन गयी। 60 के दशक में यहां पर प्लेटफॉर्म छह व सात बने। तब ट्रेनों की संख्या आज के समय के मुकाबले कुछ भी नहीं थी। 90 के दशक में यहां पर प्लेटफॉर्म नंबर आठ व नौ बने। तब यहां से करीब 110 ट्रेनें चलती थी। चारबाग रेलवे स्टेशन को संवारने के लिए पिछले वर्ष मार्च महीने में 1810 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली। इससे रिमॉड्यूलिंग का काम होना था। लेकिन यह काम पिछले एक साल में शुरू तक नहीं हो पाया। नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड और रेल एजेंसियों के बीच यह काम अभी भी पूरी तरह बंट नहीं पाया है। एजेंसियां केवल अपने अपने प्रस्ताव बनाकर भेज रही हैं। इतना ही नहीं, 14 साल बाद गोमतीनगर का काम शुरू होते ही रुक गया। 40 साल से आरआरआई बदलने की मांग हो रही है लेकिन अभी तक इसे भी बदला नहीं जा सका है। मुम्बई जाने के लिए राजधानी में पुष्पक सरीखीं कोई अन्य ट्रेन नहीं है। पुष्पक के लिए लगने वाली लंबी लाइनों से अभी तक यात्रियों को निजात नहीं मिल पाई है। यात्रियों की अनारक्षित कोचों वाली एक ट्रेन की मांग कई सालों से लंबित है लेकिन किसी भी प्रत्याशी ने इस मांग की तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया।