लखनऊ,: नारे के बिना अधूरी है चुनावी राजनीति आजादी के बाद नारे की रही है अहम भूमिका

Posted at : 2019-03-19 08:18:35

कई नारे तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए लखनऊ,:देश में चुनाव का माहौल है। राजनैतिक दलों से लेकर नेता जीत हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। ऐसे मेें राजनैतिक दलों के दिये गये नारे लोकतंत्र के इस उत्सव में काफी अहम भूमिका अदा करते हैं। वोटरों को अपनी तरफ लुभाने के लिए सभी दल ऐसे नारों का सहारा लेते है जो सीधे आम आदमी के दिल में उतर जाये और उसका मन बदल जाये। भारतीय राजनीति में नारों की भूमिका कोई नयी नहीं है। देश की आजादी के बाद से नारों ने वोटरों को लुभाने का खूब काम किया है। शायद ही देश का कोई ऐसा चुनाव रहा हो जो बिना किसी नारे के लड़ा गया हो। तो आइये हम बताते हैं इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ ऐसे नारों के बारे में जिसने चुनावी में फिजा ही बदल डाली। वर्ष 1965- पाकिस्तान युद्ध के वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था। इसका उद्देेश्य युद्ध और खाद्य संकट के दौर में देश का मनोबल बढ़ाना और एकजुट करना था। कांग्रेस ने 1967 में इस नारे का इस्तेमाल करते हुए देश में सत्ता हासिल की थी।